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दिल दरिया

(कविता संग्रह)

धर्मेन्द्र राजमंगल



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कविता---बिन साजन के सावन कैसा

बारिश की बूंदों से जलती हीय में मेरे आज सुलगती

पीपल के पत्तो की फडफड जैसे दिल की धडकन धडधड

चूल्हे पर चढ़ गयी कढाई दूर हुई दिल की तन्हाई

लेकिन सबकुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



चलती है सौंधी पुरबाई हुए इकट्ठे लोग लुगाई

उनके वो और वो हैं उनकी खड़ी अकेली मैं हूँ किनकी

हाय रे हाय ये शाम का ढलना रात बिरहिनी सुबह का खिलना

लेकिन सब कुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



रात में मोहे चाँद चिढाता दिन में सूरज सिर चढ़ आता

आँखों में यादों के डोरे साजन मैं तुम चाँद चकोरे

बहुत हुई तेरी रुसवाई जाता सावन ओ हरजाई

लेकिन सब कुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



सास ननद का ताने कसना तेरी यादें खट्टी रसना

सखी सहेली करें ठिठोली मोहे न सुहाए उनकी बोली

बारिश की ठंडी बौछारें सिहरन मुझको मारे डारें

लेकिन सब कुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



अब के आजा ओरे सईयाँ डाल दे मोरे गले में बहियाँ

मैं बन जाऊं तेरी चेरी सौलह की हो जाऊं छोरी

लाल लिपस्टिक मांग सिंदूरी रेशमी जुल्फें बदन अंगूरी

लेकिन सब कुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



सजनी से साजन का मिलना शरबत में चीनी का घुलना

रात चांदनी और मिलन सजन का मन से मन और मिलन बदन का

मैं बगिया की हुई मोरनी साजन के दिल की हूँ चोरनी

लेकिन सब कुछ लागे ऐसा बिन साजन के सावन कैसा.



कविता---बच्चों बारिस आएगी

बच्चों बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी

रिमझिम से पानी बरसेगा रह रह कर बादल गरजेगा

बूंदों में तुम खूब नहाना कागज की तुम नाव बहाना

लेकिन इतना रखना ध्यान मस्ती में न होना शैतान

कोई शरारत तुमने की तो माँ फिर से चिल्लाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



बगियों में फिर फूल खिलेंगे मक्खी खटमल खूब उड़ेंगे

रेंग रेंग कर सांप चलेगा कछुआ तब मुस्काएगा

मछली की तब होगी दिवाली तितली तब होगी मतवाली

तितली को न हाथ लगाना ये फिर से डर जाएगी

बच्चों बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



खेतों की रंगत निखरेगी फसल धान की लहराएगी

डब्बो में तुम पानी भरना तालाबों पर जा पटकना

वाटर लेवल बढ़ जायेगा मस्त मजा तब आएगा

पानी की किल्लत की फिर से ऐसी तैसी हो जाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



लहर लहर कर नहर चलेगी तुम्हें देख कर वो हँस देगी

पेड़ पेड़ पर वेल का चलना माँ का रोज पकौड़े तलना

बर्षा का हो खूब बहाना पापा का ड्यूटी न जाना

झूले पर बैठी गुड्डी तो फिर से मचक बढ़ाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



हरी फसल से खेत खिलेगा लाला जी का कर्ज मिटेगा

कृषको की तब शान बढ़ेगी धन्य धरा कहलाएगी

तालों में पानी उफनेगा टर्र टर्र मेढक फेंकेगा

प्यारे ऐसा तब होगा जब फिर से बदली छाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



पानी में भैंसों का रेला गलियों में टिक्की का ठेला

कपड़े गीले छप्पर गीले गुड के डेले होंगे सीले

ढोलक पर जब थाप लगेगी रसियों की फिर खूब जमेगी

पंगत की दावत में भैय्या फिर से रौनक आएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



गर्म जलेबी इन गाँव का मेला उन्हें खायेगा गुरु का चेला

देख के इमली लार टपकती मन करता कि मार दे झपटी

एक रूपये का पान मिलेगा होंठों पर लाली सा खिलेगा

रात जश्न की होगी दददू फिर से गोरी गाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



देखके बदली चिड़िया नाची बैठी चाय बनाती चाची

छोटू को छुट्टी की छूट लल्लन से लड्डू की लूट

मम्मी की नजरों को जाँच पापा से लो रुपया पांच

बागों में कोयलिया फिर से कूह कूह चिल्लाएगी

बच्चो बारिश आएगी फिर से ठंडक लाएगी.



दूध मलाई लल्ला खाता बजरंगी सी ताकत पाता

बाबा के कपड़े हैं तंग देख के अम्मा रह गयी दंग

मौसम के मन का मिजाज सुन भंवरा क्या करता उधेड़ बुन

मन्दिर की घंटी भी फिर से तथाअस्तु चिल्लाएगी

बच्चो बारिश आयेगी फिर से ठंडक लाएगी.



कविता---फटाफट चल पड़

धार को तेज कर चाल को बढ़ा कर

नजर को भेद कर फटाफट चल पड

सब कुछ जान ले होश से काम ले

राम का नाम ले फटाफट चल पड

कान भी कड़े हैं रोंगटे खड़े हैं

होश भी उड़े हैं फटाफट चल पड़

नजर को बदल कर राह में सम्हल कर

नियम पर अम्ल कर फटाफट चल पड़


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