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रूमी का काव्य (अंग्रेजी से अनुवाद)

देवी नागरानी

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रूमी का काव्य (अंग्रेजी से अनुवाद)

देवी नागरानी

Copyright@2018 Devi Nangrani

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रूमी का काव्य (अंग्रेजी से अनुवाद)

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सच के साथ साक्षात्कार!

कलामे-इश्क़!

अव्यक्त संगीत

एक आध्यात्मिक कोष (From: A Spiritual Treasury-Masanavi)

रूमी विद्वता (Rumi Wisdom)

झूमता मसीहा (Rumi-The Whirling Darvesh)

विचार और ध्यान (Thoughts & Meditation By Khalil Gibraan)

मन मंथन

सूफी हाफ़िज़ शेरानी

राबिया बसरी

देवी नागरानी


सच के साथ साक्षात्कार!


आत्मा का परमात्मा से मिलन एक परम सत्य है जो शब्दों के अर्थों में गुप्त व् ज़ाहिर रूप में प्रत्यक्ष है. मतलब को समझना, समझकर अपनाना हमें ही है-इसी वक़्त के दायरे में जब तक ये सांसें हमारा साथ दे रही हैं!


यह सच है कि इस स्वप्निल मायावी दुनिया में हम जी रहे है, सच को प्रत्यक्ष रूप में जीने की कला इंसान को मिली है. बस समय का सदुपयोग करते हुए सच से जुड़ना हमारा लक्ष्य है, सोते सोते जागने का एक स्वर्ण अवसर!


सूफ़ी दरवेश रूमी, को पढ़ना एक अलग संसार में विचरना है, सुने अनसुने शब्दों के बीच को पढना मात्र काफी नहीं, उन शब्दों कि निशब्ता में प्रवाहित आवाज़ को सुनना अपनी पहचान का एक नया द्वार खोलना है. यह अपने आप में खोने व् जुड़ने का पथ है. "शम्स दीवान" में उनकी तीन हज़ार कावितायें पाठकों को अध्यात्मक राह पर राहत की छाँव का अहसास दिलाती है, और दुनियवी शोर में एक ख़ामोश संदेश भी देती है जो अंदर में तन्मयता प्रदान कर पाने में पहल करती है।


देवी नागरानी

जनवरी २०१८


कलामे-इश्क़!


रूमी का यह कलाम आबीदा प्रवीन की आवाज़ में हू--हू मेरी भावनाओं का उच्चारण है!


यार को हमने जा-बा-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा

कहीं मुमकिन हुआ कहीं वाजिब

कहीं कहीं फ़ानी बक़ा देखा

यार को हमने जा-बा-जा देखा,

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा...!

कहीं वो बादशाह--तख्त नशीं

कहीं कासा लिए गदा देखा

यार को हमने जा-बा-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा.!

कहीं वो दर लिबास--माशूका

बर-सरे नाज़ और अदा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा

यार को हमने जा-बा-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा...!

कहीं आशिक नियाज़ की सूरत

सीना गिरयां--दिल जला देखा

यार को हमने जा-बा-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा

यार को हमने जा-बा-जा देखा

कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा...!


Qalaame-Ishq!


This Song of Rumi in the silky voice of Abida Praveen is the

pronounciationof my heart’s Feelings!


yaar ko humne ja-ba-ja dekha

kahin zahir kahin chhupa dekha

kahin mumkin hoa kahin wajib

kahin fani kahin baqa dekha

yaar ko humne ja-ba-ja dekha

kahin zahir kahin chupa dekha...!

kahin woh baadshaah-e-takht nasheen

kahin kaasa liye gadaa dekha

yaar ko humne ja-ba-ja dekha

kahin zahir kahin chupa dekha!

khin wo der libaas-e-mashokan

bar-sare naaz aur aada dekha

kahin zahir kahin chupa dekha

yaar ko humne ja-ba-ja dekha

kahin zahir kahin chupa dekha!

kahin aashiq niyaz ki soorat

seena Girya-o-dil jala dekha

yaar ko humne ja-ba-ja dekha

kahin zahir kahin chupa dekha

yaar ko humne ja-ba-ja dekh

kahin zahir kahin chupa dekha!


Who Am I?


If this me is not I, then

Who am I?

If I am not the one who speaks, then

Who does?

If this me is only a robe then, then

Who is the one I am covering?


मैं कौन हूँ?


अगर यह 'मैं' वो नहीं, तो

मैं कौन हूँ ?

अगर मैं वो नहीं जो बात करता हूँ, तो

कौन करता है ?

अगर यह 'मैं' सिर्फ पहनावा हूँ, तो

कौन है जिसका

मैं आवरण हूँ?


You are the light of my heart


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(Pages 1-7 show above.)