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देवी दोहावली

देवी नागरानी

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देवी दोहावली

देवी नागरानी

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देवी दोहावली

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समर्पित

पुरोवाक्

दोहा: एक परिचय

देवी दोहावली

लेखिका परिचय



समर्पित



शुभ साधन है साधना, सृजन कर्म निष्पाप

दोहा लिखना छंद में, लगता मुझको जाप



दोहे मन भावन लिखे, मन अब हुआ प्रसन्न

भूखे को जैसे मिला, बहुत दिनन में अन्न



मृदुल-मृदुल महका सुमन, गूंथा छंद का हार

सजदे में सिर झुक गया, देख सृजन संसार



दोहा मुक्तक छंद है:



ललित छंद दोहा अमर, भारत का सिरमौर

हिन्दी माँ का लाड़ला, इस सा छंद न और



उन महान दोहकारों को जो वेदों के रचयिता व् पुरानों के पुरोधा रहे. इस छंद में एक लय-सुर ताल की पीठिका स्थापित कर गए.



देवी नागरानी



पुरोवाक्



दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन -देवी दोहावली

सबको हितकर सृजनकर, पायें-दें आनंद

नाद-ताल-रस-भाव-लय, बिम्बित परमानंद



दोहा: एक परिचय



विश्व-वांग्मय का सर्वाधिक मारक-तारक-सुधारक छंद दोहा छंद शास्त्र की अद्भुत कलात्मक देन है। जन-मन-रंजन, भव-बाधा-भंजन, यश-कीर्ति-मंडन, अशुभ विखंडन तथा सर्व शुभ सृजन में दोहा का कोई सानी नहीं है। संस्कृत वांग्मय के अनुसार 'दोग्धि चित्तमिति दोग्धकम्' अर्थात जो श्रोता / पाठक के चित्त का दोहन करे वह दोग्धक (दोहा) है। दोहा चित्त का ही नहीं वर्ण्य विषय के सार का भी दोहन करने में समर्थ है। दोहा अपने अस्तित्व-काल के प्रारम्भ से ही लोक परम्परा और लोक मानस से संपृक्त रहा है। आरम्भ में हर काव्य रचना 'दूहा' (दोहा) कही जाती थी। कालांतर में संस्कृत के द्विपदीय श्लोकों के आधार पर केवल दो पंक्तियों की काव्य रचना 'दोहड़ा' कही गयी। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषाओं की पूर्वपरता एवं युग्परकता में छंद शास्त्र के साथ-साथ दोहा पला-बढ़ा और अनेक नामों से विभूषित हुआ।



दोग्ध्क दूहा दूहरा, द्विपदिक दोहअ छंद

दोहक दूहा दोहरा, दुवअह दे आनंद



हिन्दी गीति काव्य के अनुसार मुक्तक पूर्ववर्ती या परवर्ती छंद या प्रसंग के बिना चमत्कार या अर्थ की पूर्ण अभिव्यक्ति करनेवाला छंद है। दोहा दो पंक्तियों का मुक्तक काव्य है। प्रत्येक पंक्ति में २४ मात्राएँ होती हैं। हर पंक्ति दो चरणों में विभाजित रहती है। विषम (पहले, तीसरे) चरण में तेरह तथा सम (दूसरे, चौथे) चरण में ग्यारह कलाएँ (मात्राएँ) होना अनिवार्य है। सम चरणांत में लघु मात्रा की उपस्थिति अपरिहार्य होती है। पहले तथा तीसरे चरण के आरम्भ में जगण (जभान १२१ मात्रा) का प्रयोग एक शब्द में वर्जित है किंतु दो शब्दों में जगण हो तो वर्जित नहीं होता.



सुख-दुःख दो पद रात-दिन, चरण चतुर्युग चार

तेरह-ग्यारह विषम-सम, दोहा विधि अनुसार



देवी नागरानी के दोहे अनेकता में एकता की भारतीय संस्कृति की कालजयी विरासत का पोषण करते हैं. उनके दोहों में कथ्य और शिल्प संतुलन के साथ भाषिक समृद्धता का वैभव यत्र-तत्र दृष्टव्य है. एक ओर ग़ुरबत, मोहताज, साज़, हमराज़, रूहानी, दस्त (हाथ), बेताब, जनाब, हुनर, ख़ामोशी, सुराग,तकरार, गुलशन, सौदेबाज़ी,ज़िंदगी, नफ़रत, आज़ाद, आरज़ू,ख्वाब, अज़ाब, मजबूर, ख़िज़ाँ, राज़, सहरा, आब,ज़मीन, वक़्त,मासूम, अश्क़, साहिल, महफ़िल, खंज़र, नज़र, नूरानी, मौका, फौलाद, अहमक, असबाब, एकांत, नक़ाब, साबित, ज़ख्मी, अज़ाब, सरताज, नूरानी, सब्ज़, मंज़र, हासिल उर्दू लफ्ज़ पूरी स्वाभाविकता साथ इन दोहों में मौजूद हैं तो दूसरी ओर अद्भुत, शिल्पकार, किन्तु, गान, निर्मल, अक्षर, भावन, ध्यान, मृदुल,बिम्ब, आश्रम, नतमस्तक, सत्य, दर्पण, हरित, निष्पाप जैसे शब्दों की उपस्थिति देखी जा सकती है.


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