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प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018

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लोकतंत्र और रेलगाड़ी

(काव्य संग्रह)



अचल पुलस्तेय

(डॉ. आर. अचल)






समर्पण


आज जिसका स्नेह मेरा बल है,

उस माँ रामपरीदेवी और

जो भैरवी बन साथ है,

उस भार्या दुर्गा को।






पृष्ठभूमि


कविता लिखना मेरा शौक नहीं है, देश- दुनियाँ व समाज की विडम्बनायें देखकर मन प्रतिक्रियात्मक हो जाता है, जिसे तत्क्षण अभिव्यक्त करने मे कवितायें बन जाती है। इसीलिए मैं कविताओं को अभिव्यक्ति की नैनो तकनीक मानता हूँ।


इसके पूर्व मेरा काव्य संग्रह “लोकतंत्र और नदी ” इसी वर्ष (2018) प्रकाशित हुआ है, इसी क्रम में दूसरा काव्यसंग्रह “लोकतंत्र और रेलगाड़ी” प्रस्तुत है। जिसमें देश, दुनियाँ, समाज की विद्रूपताओं को प्रतिबिम्बित करने की कोशिश है, जैसे रेलगाड़ी हमारे देश के लोकतंत्र की प्रतिबिम्बित करती है।


मुझे लगता है कि किताबों में पढकर भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को नहीं जाना जा सकता है, पर रेलगाड़ी में बैठते ही राष्ट्र और लोकतंत्र, दोनों दिखने लगता है। जनरल डिब्बे से एसी डिब्बे तक घूम लीजिए तो देश के विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सास्कृतिक, भाषायी स्तरों का दर्शन हो जायेगा। यदि बात कर लिए तो लोकतंत्र का राज खुल जायेगा, महान होने का पर्दा फट जायेगा, यदि जनरल या स्लीपर मे है तों संसद जैसा बहस भी करने का शौक पूरा हो जायेगा। देश की समस्याओं और चरित्र का पता चल जायेगा, हर समस्या का आसान सा समाधान भी निकल जायेगा, एसी में खामोशी होती है, क्योकि वहाँ बहस थोड़ा सभ्य नहीं माना जाता है? इसमें भूजा वाले, चायवाले, झालमुड़ीवाले आदि नहीं के बराबर ही आते है। दरअसल इसमें चलने वाले लोग वातानुकूलित होते है, इनके ऊपर ठंडी-गर्मी का असर नही होता है, देश का हर तापक्रम इनके अनुकूल रहता है, जबकि चालू डिब्बे वाले ही देश का तापक्रम बदलते है, पर वह इनके अनुकूल कभी नही रहता है। यही लोग होते है जो गेंहूँ उगाते है,गेहूँ काटते है और गेंहूँ की बोरियो की तरह ठूस कर गेंहूँ की रोटी के लिये देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते है। विभिन्न संस्कृतियों, बोलियों, भाषाओं, वेशभूषा त्योहारों को एक में मिलाते है। पहाड़ का समुद्र से, जंगलों का रेगिस्तान से रिश्ता जोड़ कर एक विशाल लोकतंत्र और राष्ट्र बनाते हैं। हालाकि अब हालात हुछ बदल रहा है, कुछ स्लीपर वाले एसी मे, कुछ चालूवाले स्लीपर में घुसने लगे है।

रेलवे देश की सच्चाई का दर्पण है। इसमें एसी 1, 2, 3 स्लीपर और चालू डिब्बे देश के लोगों के सामाजिक आर्थिक हैसियत को दर्शाते है। रेलगाड़ी की दुर्घटनायें भी एक सच्चाई है, सबकी हैसियत बताती हैं, समय पर न पहुँचाना तो इस देश की परियोजना का प्रतिबिम्ब लगता है। रेलवे स्टेशनो पर कुछ पागल, वेन्डर, मुँगफली, पानी बेचने वाले बच्चे भी देश की तस्वीर पेश करते है।....आजादी लड़ाई में भी रेल की भूमिका रही है.........स्कूल के बच्चों को बिना टिकट पहुँचाना हो या प्रेमियों का घर से भागना हो या सामंत के बेगारी से मुक्ति के लिए बँधुओं का भागना हो, रेलगाड़ी सबकी साक्षी है। भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर को कलकत्ता ले जाना.. या आपातकाल की तानाशाही में रेल कर्मचारी से जार्ज फर्नालन्डिज का लोकतंत्र का नेता बनना हो,.... रेलगाड़ी सामान ही नहीं भारत का इतिहास भी ढोती है........पर अब सरकारे उसे बेंचना की प्रक्रिया में है इसे लाभकारी व्यवसाय बना चुकी है.......


इस तरह रेलगाड़ी समग्र भारतीय लोकतंत्र है। विशिष्ट लोगो के लिए सदा उपलब्ध है, सामान्य लोगों में लाईन में लगने पर नही अनुपलब्ध होती है.......इस संग्रह में इन्ही विडम्बनाओं की अभिव्यक्ति है, जो जरूरी नहीं कि सबको पसंद आये ही पर इतनी अपेक्षा तो है ही कि आँख की किरकिरी जैसे सोने मे बाधक बन सकती है, देश और लोकतंत्र के हालात को देखने के तरीके में त्वरण पैदा कर सकती है।


शुभमंगलम्

अचल पुस्तेय

(डॉ. आर. अचल)

















लोकतंत्र और रेलगाड़ी

कभी रुकती, कभी चलती,

कभी रेंगती, कभी दौडती

रेलगाडी,

जिसके एसी, स्लीपर, चालू

डिब्बे कपलिंग से

ईंजन से जुड जाते है,

और ऑखे मूँदे से दौडते है

पीछे-पीछे,

पर इन डिब्बों में बैठे लोगो की औकात

एक जैसी नही होती है,

ये डिब्बे

बाहर से एक जैसे दिखते है जरूर

पर अन्दर काफी अन्तर रखते है,

फिर

प्लेटफार्म भी एक जैसा होने का भ्रम देता है,

कितनी अच्छी

और रहस्यमय है

अपनी रेलगाडी

जो चलते-चलते कभी न थकती है,

बिल्कुल

हमारे लोकतंत्र जैसी लगती है ।

बडे सार्थक नामोवाली है हमारी रेलगाडी,

राजधानी, दिल्ली जैसी,

तो लोकल धूलभरे गाँव जैसी,

मालगाडी

जिसे स्टेशन भी नसीब नहीं,

जैसे मण्डी का पल्लेदार दिनभर

भरी बोरियाँ ढोता है

रात को खाली बोरियाँ बिछाकर

पुटपाथ पर सोता है ।

वैसे ही मालगाड़ी

जिन्दगी का बोझ लिए चलती है,

बिल्कुल हमारे लोकतंत्र जैसी लगती है ।

भोगती है झेलती है

यह भी दुष्कर्मो को,

हत्या,डकैती से कॉपती है

अपहरण,बलात्कार और घोटालो से हॉफती है

नदियों लाँघती है, पुलों से गुजरती है

बिल्कुल हमारे लोकतंत्र जैसी लगती है ।

बिरहन की ऑखो मे ऑसू भर

खुशी कभी गम गुनगुनाती है

रिश्ते बनाती है,तोड़ती है

शायद जब थकती

लेट होकर चलती है

बिल्कुल हमारे लोकतंत्र जैसी लगती है ।

पर्वत से सागर का ,वन का मरुस्थल से

जाति-घरम जाने बिन

रिश्ते बनाती है,

साक्षी इतिहास की है,

काकोरी देखा है,

जीवन की रेखा है

लाखो-करोड़ो की रोजी औ रोटी है

फिर भी क्यो बिकती है

बिल्कुल हमारे लोकतंत्र की जैसी लगती है।





















यात्री


जिन्दगी,
एक ऐसी रेलगाड़ी जैसी है,
जो कहाँ से चली थी
कहाँ तलक जायेगी,
कम से कम
मुझे तो बिल्कुल ही
पता नहीं ।
कुछ पहले से बैठे मिले,
कुछ साथ ही चढ़े,
कुछ  बाद में,
अगले स्टेशनों पर,
आकर बैठ गये साथ में,
लगा कि
यह यात्रा कितनी खूबसूरत है,
सुखद है,
साथ-साथ बहुत दूर तक
जायेगें हम ।
 पर ये लोग,
बेरहम से
बिना आभास दिये ही,
चुपके से,
न जाने किस-किस स्टेशनों पर
उतरते चले गये,
ये खाली-खाली

अगल-बगल के बर्थ

सीने में चुभ रहे हैं।

 





















काश! रेलगाड़ी होती


काश् रेलगाड़ी न होती

तो हम घोड़ो से चलते

जो मेरे अलावा किसी के पास न होते ,

मैं सैनिक या व्यापारी होता

मेरे पीछे लोग गदहे-खच्चर

या पैदल चलते,

भारत में बहुत से देश होते

सीमाओं से पार होने को लिए

कदम-कदम पर लोग लड़ते ।

शहरों में नहीं होती भीड़

पसीनें बस खेतों में बहते

किसान होता गिरवी

मजदूर साहूकार के घर बिकते,

बिकानेर की भुजिया

पहाड़ नही चढ़ती

मनाली का सेब

कोच्ची नहीं जाता

जहाँ जो उगता बस वहीँ रह जाता

गाँधी का देश गुजरात रह जाता

मँगरू,लखेदन और सियाराम

रामसिंह,खुदाबक्श पाड़े

एक साथ कभी नहीं चलते,

आदमी पहाड़ का

गाँव का, गिरावँ का,

मोतियाँ कथाओं में चुनते

लोकतंत्र क्या होता

पुस्तकों में पढ़ते

काश् रलगाड़ी न होती

तो घोड़ो पर चलते ।

















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