Excerpt for बच्चे सोचते हैं (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
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कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ



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बच्चे सोचते हैं
(काव्य संग्रह)



कवि
महेश रौतेला







महेश रौतेला

फोन: 9426614203

जन्म-स्थान: खजुरानी (अल्मोड़ा)

जन्म-तिथि: 25 जुलाई, 1955


शिक्षा: एमएससी (रसायन विज्ञान), कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल


सम्प्रति: लेखन कार्य

प्रकाशन: क्षणभर, वर्षों बाद, हे कृष्ण, कभी सोचा था, वसंत, हमीं यात्रा हैं, नानी तुमने कभी किसी से प्यार किया था। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

सम्पर्क: 19, मारूतिनन्दन चाँदखेड़ा, अहमदाबाद - 382424













































बच्चे सोचते हैं



बच्चे सोचते हैं-
माँ कभी बीमार नहीं होती
उसके घुटनों में दर्द नहीं होता
हाथ नहीं दुखते
शरीर थकता नहीं,
वह घंटों जो कहती है
वह व्याख्यान होता है।
माँ कहती है-
"सज अपने घर में आती है"
माना वह पहला प्यार हो।
बच्चे सोचते हैं-
पिता के पैसे कभी खत्म नहीं होते
उसके कंधे कभी नहीं झुकते।


























मैं चमकता सूरज नहीं



मैं चमकता सूरज नहीं
पर चमक लिये तो हूँ,
मैं चमकता चंद्र नहीं
पर स्पष्ट दिखता तो हूँ,
मैं बहती नदी सा नहीं
पर बहाव तो हूँ,
मैं पहाड़ सा नहीं
पर अडिग तो हूँ,
मैं वृक्ष सा नहीं
पर फलदार तो हूँ,
मैं फूल सा नहीं
पर खुशबूदार तो हूँ।






















मर चुके हैं


हमारे विद्यार्थी मर चुके हैं
हाँ, मर चुके हैं
या सरकार उन्हें मार रही है।
हमारे शोधार्थी मर चुके हैं
हाँ, मर चुके हैं
या सरकार उन्हें मार रही है।
हमारे जनता मर चुकी है
हाँ, मर चुकी है
या सरकार उसे मार रही है।
क्योंकि ये नहीं करते विरोध
नहीं जताते आपत्ति
विदेशी भाषा की अनिवार्यता
के विरुद्ध,
या हमारी सरकार ही मर चुकी है।
























मैंने सपने से पूछा



मैंने सपने से पूछा-
तुम कहाँ थे इतने समय तक
भारत में थे या भारत से बाहर
सरकार में थे या विपक्ष में
मतदाता थे या नेता
इतिहास में थे या अतीत में
आँचल में थे या अभाव में
खाना बना रहे थे या खा रहे थे
खेल रहे थे या खिला रहे थे
वादी थे या प्रतिवादी थे
न्याय थे या न्याधीश थे
शिक्षा में थे या शिक्षार्थी थे
घर में थे या घर से बाहर
संविधान में थे या संविधान से इतर,
सड़क पर थे या संसद में
मनुष्य में थे या मनुष्य से अलग
सपना चुप था,गुमसुम बैठा था
प्रश्नों से जूझ रहा था।


















सपना देखना चाहिए



सपना देखना चाहिए
मनुष्य बनने का,
यदि मनुष्य ही न बन पाये
तो राज्य कैसे बनेगा?
राम बने थे
तभी राम राज्य आया था।




































आने दें जिन्दगी को



आने दें जिन्दगी को
देखें कैसे-कैसे चलती है
रिश्तों के बीच कैसे ढलती है
सीमाओं पर कैसे खड़ी रहती है
कैसे बचपन को याद करती है
यौवन में कैसे लौटती है
बुढ़ापे का कैसे सामना करती है?
उसे ठंड और धूप में चला दें
कटीली झाड़ियों से गुजरने दें
वैश्विक बना, अपनी खुशबू दे दें।
उड़ने दें इस क्षितिज से उस क्षितिज तक
उसके प्यार को टहलने दें
ऊँचाई दे, हिमालय सा चमकने दें।
इन गड्ढों ,इन उदासियों, इन निराशाओं से
जय, जय, जय और जयकार में उठा दें।




















अद्भुत दिनों की बातें हैं ये


अद्भुत दिनों की बातें हैं ये
जब प्यार के लिये मीलों चले थे,
मुस्कान कभी बुझी नहीं थी
थकान कहीं लगी नहीं थी।

दोस्ती के चरण बहुत फैले हुए थे
दिनों की कोई सीमा नहीं थी,
जहाँ से चले, फिर वहीं आ गये थे
प्यार के लिये वर्षों चले थे।

अद्भुत कथा के पात्र हम बने थे
आरंभ से अंत तक जगमगाते रहे थे
प्यार का हुनर हम में बहुत था
कह भी गये हम, दोहरा भी दिये हम।

उनसे जो कहा नहीं गया था,
हमने कह कर दिखा दिया था,
वह बात और थी कि पासा जो पलटा,
हम भी नहीं थे, वे भी नहीं थे।





















मेरा गांव


आज मैंने गांव से कहा-
एक कहानी सुनाओ
दादा-दादी की तरह
नाना नानी की तरह।
उस पेड़ की तरह
जो फल फूल देता है,
उस खेत की तरह,जो अन्न देता है।
गांव बोलने लगा-
झोला ले विद्यालय गया
सड़क -रास्ते बनाने लगा
बच्चों की टोली सजाने लगा
देश का खाका खींचने लगा,
अंधविश्वासों की मरम्मत करने लगा।
बचपन की बातें बताने लगा
राजा-रानी के घर में झांकने लगा
माँ की कहानियां बांचने लगा
पिता का संदेश सुनाने लगा।
उधर घराट की आवाज आने लगी
देवों के किस्से बनने लगे
घसियारियों की बातचीत होने लगी
कबड्डी का मैदान दिखने लगा
गुल्ली ,झाड़ी में अटक सी गयी,
ठंड में पारा जमने लगा
हवा में शीत बहने लगी
घरों के किवाड़ बंद होने लगे
अंगीठी की आग लुभाने लगी
रातों की कथा रस देने लगी।
वह लड़की जो संग आने लगी थी
बड़ी हुई तो शरमाने लगी थी,
बहुत से किस्से अजब-गजब थे
मधुशाला से निकलते ,गोबर में फिसलते।
गांव अब मेरा ठहर सा गया है
नयी तकनीक में फँस सा गया है,
पलायन का एक अड्डा दिखा है,
आज एक विद्यालय टूटा मिला है।












































मैं इस शहर को भलीभाँति जानता हूँ



मैं इस शहर को भलीभाँति जानता हूँ,
जहाँ जीभर घूमा हूँ
उड़ते पंछियों को देखा हूँ
गहरी नींद सोया हूँ
पढ़ा हूँ, गुना हूँ
ठंड को ठंड से पहिचाना हूँ
प्यार को प्यार से जाना हूँ
मैं इस शहर को बहुत याद करता हूँ।
इसी शहर ने मुझे पंख दिये
कि मैं फड़फड़ा सकूँ
या फिर लम्बी उड़ान भर लूँ
या फिर पंखों को पानी में भिगो
कुछ भारी कर, कुछ छटपटा
गुनगुनी धूप में तरोताजा हो
जब -तब इसका आभार ले
दुनिया को इसमें समेट लूँ।
जो मैं सुबह कहता हूँ
वह शाम तक सच रहे या न रहे,
पर इस शहर का प्यार
मुझमें मरता नहीं
चाहे कहूँ या न कहूँ।












मैंने वृक्ष से पूछा


मैंने वृक्ष से पूछा
तुमने प्यार किया क्या,
वह कुछ नहीं बोला
लेकिन प्राण वायु देता रहा।
मैंने जल से पूछा
तुमने प्यार किया कभी,
वह कुछ नहीं बोला
लेकिन जीवन देता रहा।
मैंने आकाश से पूछा
तुमने प्यार किया क्या,
वह कुछ नहीं बोला
लेकिन असंख्य नक्षत्र दिखाता रहा।
मैंने धरती से पूछा
तुमने प्यार किया कभी,
वह कुछ नहीं बोली
लेकिन आश्रय देती रही वर्ष दर वर्ष।






















प्यार में धड़कता दिल



प्यार में धड़कता दिल
धीमा पड़ गया है
जो धड़कनें हैं
वे बेतरतीब हो चुकी हैं।
हिमपात भी कम हो गया है
धूप तेज लग रही है
बादलों में गर्जन अभी भी है,
घर पुराना हो चुका है
दीवरों पर सीलन आने लगी है।
उत्तरांचल और स्विट्जरलैंड के पहाड़ों को साथ-साथ खड़े कर
एक ठंडी सांस लेता हूँ,
बर्फ हाथ में ले, लगता है
ठंड एक जैसी है,
पहाड़ियों के झुंड एक जैसे हैं
नदियों का झुकाव गदगद करता है,
पेड़ों की उजास तरावट लाती है
हवायें एक जैसी हैं,
प्यार में धड़कता दिल
यहाँ भी है, वहाँ भी है,
लेकिन मेरी धड़कने
बेतरतीब हो चुकी हैं।


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