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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
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एक दिन सभी स्त्रियाँ नग्न हो जाएंगी









ललित कुमार मिश्र











ललित कुमार मिश्र



साहित्यिक उपनाम

विदेह निर्मोही, सोनीललित, प्रकृति नवरंग


9868429241 sonylalit@gmail.com



जन्मस्थान: बिहार

जन्मतिथि: 16 मार्च 1976


शिक्षा: स्नातक, राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय


विधाएं: कविता, लघुकथा


















एक दिन सभी स्त्रियाँ नग्न हो जाएंगी



तुम जानते हो

स्त्रियों को अपनी देह से प्रेम होता है

उनकी जान उनकी देह में ही होती है

इसीलिए वे इसे सजाती सँवारती

और सलीके से ज़ाहिर करती हैं

वे कभी भी पूर्णतः नग्न नहीं होतीं

तुम फिर भी उसकी मर्जी के बिना

बार-बार उसकी देह कब्जाते हो

उसपर महाभारत रच जाते हो

पर क्या कभी तुमने सोचा है

अगर उनका देह प्रेम खत्म हो जाए

उन्हें नग्न होने में आनंद मिलने लग जाए

देह की भूख उनमें भी जग जाए

और वे भी नित नई देह पर

महाभारत रचने लग जाए

तुम चंद सेकंड भी नहीं टिक पाओगे

दस दस मिलकर भी उसकी भूख नहीं मिटा पाओगे

तुम सोच रहे होगे कि खरबूज छुरी पर गिरे

या छुरी खरबूज पर

बात तो एक ही रहेगी

पर तुम विज्ञान शायद भूल गए

सिर्फ गिरना ही काफी नहीं होता

किस तरीके से गिरा

यह भी महत्वपूर्ण होता है

बेतरीक़े से गिरा खरबूज

छुरी की धार तक को तोड़ सकता है

उसे पंगु भी कर सकता है

स्त्रियां भी जब नग्न हो जाती हैं

तो बेतरीक़े ही गिरती हैं

क्योंकि नग्न स्त्रियां

पशु से भी अधिक खूँखार हो जाती हैं

अगर यह सिलसिला न रुका तो देखना

एक दिन सभी स्त्रियां नग्न हो जाएंगी



















काश! माँ मर जाती



जैसे पिताजी मर गए थे कुछ साल पहले

काश! माँ भी मर जाती

और मर जाते वे सब

जो मुझसे भावनात्मक रूप से जुड़े हैं

हालांकि बात एक ही है

संसार में भावनात्मक सम्बन्ध

केवल माँ-बेटे/बेटी का ही होता है

क्योंकि बच्चे भविष्य होते हैं

भविष्य ख्वाब होते हैं

और ख्वाब प्रकृति की भांति

परिवर्तनशील होते हैं।

बाकी सभी सम्बन्ध जरूरत

और उससे उपजी उम्मीदों से बंधे होते हैं

जरूरत संभावनाएं तलाशती हैं

और संभावनाएं संबंध।

संभावनाएं खत्म होते ही

सम्बन्ध भी खत्म होने लगते हैं।

वैसे मरने को तो मैं भी मर जाता

किन्तु मेरे मरने से मेरी समस्याएं नहीं मरतीं

बल्कि रोज तिल-तिल मरती माँ

जैसे अभी मर रही है

पर वह पिताजी की तरह सौभाग्यशाली नहीं है

क्योंकि उनके मरने के बावजूद

उनका स्वाभिमान नहीं मरा।

काश! माँ भी मर जाती

जैसे पिताजी मर गए थे कुछ साल पहले

तो वह इस तरह नहीं मरती

तिल-तिल





































मुझे अपनी जरूरतें पसंद हैं


मैं तुम्हें चाहता हूँ या नहीं

नहीं जानता

किन्तु रात को जब तुम्हारी ओर

करवट लेता हूँ

और मेरे हाथ तुम्हारा स्पर्श नहीं पाते हैं

तो मैं चौंक जाता हूँ

मेरी आँखें खुल जाती हैं

और तलाशने लगती है तुम्हें

चारों तरफ

मुझे तुम्हारी कमी महसूस होती है या नहीं

नहीं जानता

किन्तु मित्रों के लाख कहने पर भी

किसी पार्टी या पिकनिक पर नहीं जाता

बाज़ार का कोई भी आकर्षण

मुझे बांध नहीं पाता

ऑफिस से निकलते ही

बस दौड़ पड़ता हूँ

घर की ओर

मैं तुम्हें मानता हूँ या नहीं

नहीं जानता

पर जब तुम किसी चीज की

डिमांड करती हो

और मैं उसे चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता

तो मैं अपने सामर्थ्य को

बढ़ाने में जुट जाता हूँ

जी जान से

मैं तुम्हें ठीक से जान पाया या नहीं

नहीं जानता

पर इतना अवश्य कह सकता हूँ

कि मैं जब जब कहीं दूर

बल्कि बहुत दूर

जाने के लिए कदम बढ़ाता हूँ

मेरी आँखों से आँसू बरसने लगते हैं

कदम कांपने लगते हैं

मन अशांत हो जाता है

मेरी ज़िंदगी में तुम क्या मायने रखती हो

नहीं जानता

पर इतना अवश्य जानता हूँ

कि हार और जीत के द्वंद्व में

मैं जब जब गिरता या उठता हूँ

मेरी निगाहें तुम्हें ही तलाशती हैं

हाँ, यह सच है

मैं नहीं जानता

प्रेम और जरुरत में फर्क

किन्तु यह भी सच है

कि तुम मेरी जरुरत हो

और मुझे

अपनी जरूरतें पसंद हैं

किन्तु तभी तक

जब तक इनका अस्तित्व है





मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया


हम भाई-बहन में से

एक को ही अच्छा स्कूल मिल सकता था

वो स्कूल भाई को दे दिया गया

मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया

मुझे उच्च शिक्षा प्राप्त करनी थी

पिताजी को कन्यादान से मुक्ति की जल्दी थी

मेरा कन्यादान कर दिया गया

मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया

मुझे जीवनसाथी की तलाश थी

पतिदेव को स्त्री की ख्वाहिश थी

पहली ही रात मेरा अनावरण कर दिया गया

मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया

मैं अपना यौवन जीना चाहती थी

मेरी सास को पोते की चाह थी

मुझसे मेरा यौवन छीन लिया गया

मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया

बेटे की उड़ने की इच्छा थी

मैं अब सच में दुविधा में थी

मेरे ख्वाबों को उधेड़ पंख बना दिया गया

मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया















रहस्य


तुम्हारी देह का

मानचित्रण करके

वह तुम्हें तंग तो कर सकता है

किन्तु नियंत्रित नहीं

क्योंकि तुम्हारी जंघा के तिल से

यह बिलकुल भी पता नहीं चलता

कि तुम किस बात पर हँसती हो

तुम किस बात पर रो देती हो

तुम कब उदास हो जाती हो

तुम कब चहचहा उठती हो

तुम कब मौन जो जाती हो

तुम कब क्रोध से भर जाती हो

तुम कब कमजोर और लाचार हो जाती हो

और तुम कब सशक्त हो पलटवार करती हो

क्योंकि देह इंद्रियों के प्रभाव में होता है

और इंद्रियां मन के प्रभाव में।








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