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Excerpt for मैं और मेरे एहसास (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords


प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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मैं और मेरे एहसास
(काव्य संग्रह)






लेखक
रमेश संघवी














रमेशकुमार मनमोहनदास संघव

98241 64623 rmsanghavi131@gmail.com

पेशा:- रिटायर्ड कर्मचारी, बैंक ओफ बड़ौदा

पता:- ऋषिकेश, सांई सोसाइटी, ब्लॉक नंबर 1, मणीनगर, अमरेली365601 (गुजरात)









सादर आभार



सबसे पहले मैं मेरा यह काव्य संग्रह “मैं और मेरे एहसास” के लिए श्रीमती सबा खान जी (भोपाल) का दिल से बहुत आभारी हूँ! सबा खान जी खुद लेखिका हैं…नौकरी भी करतीं हैं…बच्चों और पिछड़ी जातियों के लिये भी काम करती हैं…इतनी सारी व्यस्तता के बावजूद भी इस काव्य संग्रह के लिये इसकी ई फाइल तैयार करने में सबा खान जी ने खुशी खुशी मेरी बहुत ही मदद की है

मेरे परम मित्र श्री अशोक कटेसीया जी (मेरे कालेज के मित्र) और श्री रामजी भाई गोहिल जी (मेरे बचपन के मित्र), जिन्होंने मेरी जिन्दगी के हर मुश्किल वक्त में मेरा तन, मन और धन से साथ निभाया। मुझे संभाला। उसके लिए मैं उन दोनों का दिल से आभार व्यक्त करता हूँ!

मेरे परम मित्र श्री रोहित भाई जीवाणी जी, जो बहुत ही विद्वान ज्योतिषी है, वास्तु शास्त्री है, अच्छे कवि भी है, जिन्होंने समय समय पर मेरा मार्गदर्शन किया है, उनका भी दिल से आभार व्यक्त करता हूँ !



मेरे सारे फेसबुक मित्रों का भी दिल से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मेरी रचनाओं को सराहा। उनकी सराहना के कारण ही मैं गुजराती होने के बावजूद भी हिंदी में इतनी रचनाएँ कर पाया!































गज़ल

1.



कहाँ है ठिकाना, कहाँ ढ़ूँढ़तें हैं !

दिलों में चलो अब खुदा ढ़ूँढ़ते है !



नहीं कोई यूँ ही सिसकता, सहमता,

दिलों में दबी दास्ताँ ढूँढ़तें हैं !



तड़पना, तरसना, ये आहें, ये आँसुं,

न होंगे यूँ ही, चल वजह ढ़ूँढ़तें हैं !



घुटन ही घुटन साँस महसूस करती,

परिंदे खुला आसमाँ ढूँढ़तें हैं ।



जहाँ छोड़ने का मझा भी उठा लें,

चलो खुब सूरत समां ढूँढ़तें हैं ।







2.



बेखुदी रहते मझा उसका उठा पाया नहीं,

कौन सा नग़मा यहाँ पर वक्त ने गाया नहीं ?



वक्त से फरियाद करना वक्त की तौहीन है,

वक्त के रहते भला मैं ही संभल पाया नहीं !



हो सिकंदर या फकीरा, आम हो या खास हो,

कौन है जो वक्त के हाथों ख़ता खाया नहीं ?



है कहीं कुछ तो कमी बंदे तेरे ही सब्र में !

कौन सा है मामला जो वक्त सुलझाया नहीं ?



वक्त की गिरफ्त में सारे जहाँ की गरदनें,

वक्त की रफ्तार से कोई उलझ पाया नहीं।











3.



मैं नहीं केहता कोई मज़हब न होना चाहिए !

साथ में, पर मज़हबी ईमान होना चाहिए ।



अय पंडितों, अय मौलवी गुरूर अपना तोड़ दो !

फिर कहो हमसे, कहाँ सर को झुकाना चाहिए ।



मज़हबी 'गर बंदिशें सजदा कहीं पर रोक दे,

फिर वहाँ बेमज़हबी शमशान होना चाहिए !



तसबी - माला छोड़ कर तलवार अब उठाइये !

इंन दरिंदों पर करारा वार होना चाहिए ।



अब इबादत से हिला दो ये ज़मीं, ये आसमाँ,

अब यहाँ मोहमद-कन्हैया जन्म लेना चाहिए ।









4.



ज़ुल्म है हद में अभी, खामोश रहना चाहिए,

है अगर दिल में बगावत, और पलना चाहिए !



क्या पता फिर कौन पगला तख़्त को हासिल करें ?

वक़्त कहता है अभी सर पर बिठाना चाहिए !



तख़्त के नीचे दबें हम, और कुचलेंगे अभी,

है तकाज़ा वक्त का, हर ज़ुल्म सहना चाहिए !



रस्म है सदियों पुरानी, ज़ुल्म तो होते रहें,

ज़ुल्म जब हद से बढ़ें, हुंकार भरना चाहिए !



आग है सब के जिगर में, और पलने दो अभी,

वक़्त '' अपना '' देख कर सब फूँक देना चाहिए !











5.



कब, कहाँ, कैसे हुआ ये हादसा है ?

एक था “इनसान” अब जो लापता है !



एक बच्चे की तरह हँसता-हँसाता,

क्या पता कैसे हुई ऐसी ख़ता है !



सरजमीं तो है अभी वो ही हमारी,

खुशनुमा चलती हवा लेकिन कहाँ है !



खौफ़ छाया हर गली हर गांव पर है,

कौन ये खंजर लिये यूँ घूमता है !



दो कदम कोई कहाँ अब साथ चलता !

कौन है जिसने बढ़ाया फासला है ?



पत्थरों के बोझ से ईश्वर लदा है,

घमॅ छुपा है कहाँ किसको पता है !





6.



हो बेवजह परेशां, कुछ भी हुआ नहीं है,

कुछ लोग हैं जिन्होंने दिल को छूआ नहीं है।



हैं ख़्वाहिशें सभी की, एहसास है सभी के,

ये बात है अलग कि सब की जुबाँ नहीं है !



उनका नहीं कुसूर ये, सब को सुनाई ना दे,

कोई भी शख़्स बिलकुल ही बेजुबाँ नहीं है।



दिल के चिराग रोशन है कहीं अभी भी,

सल्तनत तमस की चारों तरफ नहीं है।



तूं भी चिराग अपना रोशन यूँ ही किए जा !

हर दिल बुझा बुझा सा अब तक यहाँ नहीं है।











7.



यहाँ “इनसान” है सारे, कही कुछ तो कमी होगी !

किसी के दर्द पर हर आँख में कैसे नमी होगी ?



सभी हैं वक्त के प्यादे, खुदी को भूलना होगा,

कहीं अर्थी उठानी है, कहीं डोली सजी होगी।



सुनहरे ख़्वाब भी रखना, हकीकत से जुड़े रहना,

पड़ेंगे पाँव में छाले, डगर आसाँ नहीं होगी !



समंदर है, भँवर भी है, हमें बहना इसी में है,

किनारा है अभी तो फिर कभी मज़धार भी होगी।



वजह ना पूछना कोई कभी सुखें दरख़्तों से,

कलेजा फूँक दे ऐसी वहाँ पर आग ही होगी !



तमाशा खत्म है अब तो अकेला छोड़ दो यारों !

बुलावा आ गया है, अब ज़रा सी बंदगी होगी।





8.



जज़्बात सो गये हैं, अल्फ़ाज़ खो गये हैं,

कैसा नशा चढ़ा है ? सब ख़्वाब हो गये हैं !



थोड़ी सी आग लाओ, इस खून को जलाओ !

अरमाँ कभी उबलते क्यों आब हो गये हैं ?



कैसा ज़हर ये फैला इस मुल्क की हवा में !

शामों-सहर सभी के बेजान हो गये हैं ।



मज़हब के नाम पर ही मज़हब सुलग रहें हैं,

कितने ही काशी - मक्का वीरान हो गये हैं !



कुछ देर तूं भी सो जा ! कुछ देर हैं ये मंज़र,

वो राम और रहीमा कुछ देर सो गये हैं !











9.



खेल युगों से जारी है,

तूं क्यों इतना भारी है ?



लोग यहाँ के धुआँ धुआँ,

कैसी ये चिनगारी है !



बहुत नचाया है तुझको,

आज फसा मदारी है !



रोज ज़िन्दगी चाल चले,

आज तुम्हारी बारी है !



एक चाल चल ! क्यों रुकता ?

साँस अभी भी प्यारी है ?











10.



कैसी ये फुलवारी है ?

कांटे फूल पर भारी है !



बात कौन सी है इसमें ?

रोज चींखती नारी है !



ख़्वाब सुलगते आयें हैं,

रात आज की भारी है !



रोज उज़डता एक चमन,

आज तुम्हारी बारी है !



कयूँ उलझा है साँसों में ?

चलने की तैयारी है !











11.



कोई पिछड़ों की गली में रात को जाना कभी,

अश्क जो तुमने दिये हैं, आँख में लाना कभी !



देखना ! कैसी जिगर में हो रही होगी जलन,

ठोकरें उनकी तरफ दो चार ही खाना कभी !



ये अभी '' इन्साँ '' नहीं क्युं ? जिस्म भी है, जान भी !

ज़िल्लतें इन बे बसों सी एक पल सहना कभी !



कोई ना रोटी तरसता, भूख छोटी बात है !

प्यार की थोड़ी कमी महसूस तो करना कभी !



ये तुम्हारा ही किया है, होश में आओ ज़रा !

ये तरसते हैं तुम्हें, बस प्यार से छूना कभी ।











12.



मुझको नहीं मिला जो, शायद तुझे मिलेगा,

तुझको अगर यकीं है, आगे यूँ ही बढ़े जा !



अंजाम हर कदम का मिलना यहाँ तो तय है,

ठोकर लगेगी हर दम, बेहोश 'गर चलेगा !



अब छोड़ ये किताबें मज़हब की बात करती,

यूँ ही भटक न जाना, कुछ ना यहाँ मिलेगा !



मैं तो भटक रहा था तन्हाई़यों में अपनी,

तुझको मिला है रहबर, तो साथ यूँ चले जा !



उसको दिखाई दी है मंजिल खुदी के अंदर,

थामे उसी का दामन तुझको खुदा दिखेगा !











13.



मन, ज़रा आराम दे, कुछ सब्र कर !

देख मैं कितना चला हूँ, कद्र कर !



पैर कितने लड़खड़ाते, देख ले,

या ज़रा सा थम, नहीं तो कब्र कर !



नींद के नामों नीशाँ भी ना रहें,

बेवजह यूँ ख़्वाब में ना व्यस्त कर !



साँस ना यूँ ही कहीं दम तोड़ दे,

जिस्म को इतना भला ना त्रस्त कर !



आँख लग जाए अगर लंबी बहुत,

हश्र क्या होगा तेरा ये फिक्र कर !











14.



है गुलिस्तां ये जहाँ, तूं साँस भर के देखे ले,

रूह तक होगी महक, एहसास कर के देख ले !

देख कितने हाथ बढ़ते हैं उठाने के लिए,

एक बच्चे की तरह तूं मुस्कुरा के देख ले !



राह तो सब को मिली, उम्मीद होनी चाहिए,

बैठ ना मायूस यूँ, नज़रें उठा के देख ले !



है यहाँ नक्शे कदम, मंजिल भी होनी चाहिए,

हौसला बुलंद कर, कुछ दूर चल के देख ले !



हौसला सब का बढ़ें है, जोश भरता पांव में,

काफ़िला मंजिल तरफ है, साथ चल के देख ले !











15.

हो हकीकत या फसाना, ढूँढ़ले !

मुस्कुराहट का बहाना ढूँढ़ले !



यूँ ज़रा सी बात पर क्या रूठना ?

एक अच्छा सा बहाना ढूँढ़ले !


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