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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
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सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN

कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ




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अलंकरण

(काव्य संग्रह)





लेखक

अंकित बाजपेई









आप सभी पढ़ने वालों को बहुत बहुत धन्यवाद!!



ईश्वर की असीम अनुकम्पा से ये रचनाएं एक संग्रह के रूप में आपके सम्मुख हैं, बेशक कुछ गलतियाँ होंगी, और ये मानवीय स्वभाव से होनी भी बनती हैं, मगर दोबारा न हो इसके लिए आप अपने सुझाव और आशीर्वाद मुझे फेसबुक प्रोफाइल या 8299470141 पर दे सकते हैं, या फिर ankitbajpai031@gmail.com पर मेल कर सकते हैं! मैं ये बात कहना चाहूँगा कि मेरी कविताओं में भावों की ही प्रमुखता मिलेगी, शायद मेरे लिए सबसे जरूरी हैं मेरे भाव, मुझे पता है मेरी हर भावना को आप भी महसूस कर पाएँगे मेरी कविताओं के माध्यम से। मैंने कई सारे भाव अपनी कविताओं के जरिये आप तक पहुंचाने की कोशिश की है। आपको अच्छी लगें तो मुझे मेरे नंबर पर अवगत कराएं ताकि मुझे और अच्छा लिखने की प्रेरणा मिलती रहे।

किताब के शीर्षक के लिए प्राची त्रिपाठी जी को तहे दिल से शुक्रिया जिन्होंने बहुत सटीक नामकरण किया किताब की कविताओं के अनुरूप।


इसके बाद एक लघुकथा संग्रह और एक उपन्यास की तैयारी है। फ़िलहाल तो आप इस किताब का मज़ा लीजिये, और कम से कम अपने एक सबसे अच्छे दोस्त को ये किताब पढने को कहियेगा। मुझे आपके सहयोग की पूरी आशा है।



अंकित बाजपेई

































मुझे ऐसे शहर में घर नही चाहिए



सिलवटों में चादरों की बिक जाए प्यार जहाँ,

मुझे ऐसे शहर में घर नहीं चाहिए|

स्पर्शों में हवस हो सम्मान की ना हो जगह,

मुझे ऐसे शहर में घर नहीं चाहिए|



गूंजती रहीं हों जहाँ सिसकियाँ सन्नाटों में,

फंस गयी हों हिचकियाँ शोरगुल के काँटों में,

उम्मीद ने तोड़ा हो दम विश्वास की छाया में जहाँ,

मुझे ऐसे शहर में घर नहीं चाहिए|



रोज़ उलझती रही नाराज़गी वादों के संग,

बदलता गया हो जहाँ आँखों का सुहाना ढंग,

तय हो चली हो सज़ा गुनाह से पहले ही जहाँ,

मुझे ऐसे शहर में घर नहीं चाहिए|







दावानल



धड़कनों की साँसों से अब

लय जुदा होने को थी,

झुलसाती लपटों की जब

वो गवाह होने को थी,

हर दर के ताबीज़ों ने

उसका दर्द बांटा ही नहीं,

बेवजह वो दर्द की

जलती हवा होने को थी|



नसों में फूलता खून

आखिर फट पड़ा,

डूबता सूरज भी जैसे

आँखें मूँद कर छुप गया,

सूरज और इसका संग

रोज़ पहली किरण से था,

आज वो सूरज के ही संग

बस फना होने को थी|



नश्तरों से चुभ रहे थे

ताने और शिकायतें,

तीरों सी छू छू कर

निकलती रही रिवायतें,

नसीहतें भूल खुदगर्ज़

अब होने को थी,

सम्मान पाने की ललक में

वो खुदा होने को थी|



















करवटें



वो करवटें बदल रही,

आसमां की चाहत में

ज़मीन खोजती रही,



नमक भरी सी ज़िन्दगी में

शहद घोलती रही,



लकीर पीटती रही

चार लोगों के वास्ते,



चहक कर झूठे मन से

मगर कायदे ढोती रही|



मरने के इंतज़ार में दिन

वो दिन निकालती रही,



रोज़ रोज़ टूट कर

खुद को सम्भालती रही,



क्यूँ किसी से टूटी वो

ये ही सोचती रही,

आसमां की चाहत में

ज़मीं टटोलती रही|



निष्कलंकता का जो

प्रमाण हमसे मांगते,



उनमें से कितने हमारा

सम्मान करना जानते,



बस इन्हीं सवालों से

खुद को कचोटती रही,



दबी हुई कराह में

चुप चुप कर रोती रही|





































स्तम्भ



आसमां पर रह ज़मीं पर,

भी टिकता कौन है?

बदलियों में धूप तले चलते

दिखता कौन है?

चिराग तले अँधेरा बताते

मिलते लोग सब,

खुद मशाल बन तम से लड़ते

दिखता कौन है?



बारिशों में भी सीने में जहाँ,

आग धधकती रही!

सुलगती धूपों में हिम्मत सूर्य-सी

चमकती रही!

बदल गये मौसम भी मगर कदम

न पीछे हट सके,

बरसती गोलियों में भी आगे

बढ़ते दिखता कौन है?

खुद मशाल बन तम से लड़ते

दिखता कौन है?



धागों पर झूलती हुई जिंदगियां

बचाने को,

जूझ पड़ते काल से भी सर

देश का उठाने को,

आसान करते चलते हैं जीवन

हमारा हर तरह,

वरना यूँ जान सबकी बचाते

दिखता कौन है?

खुद मशाल बन तम से लड़ते

दिखता कौन है?



हौसला हारे सबका जहाँ,

वो केतलियाँ गर्माते हैं,

भूखे रह भी चेहरे पर

शिकन तक न लाते हैं,

आठों पहर नींद से पलकें न

उनकी हारतीं,

हरी वर्दियों में गर्व से मुस्कुराते

दिखता कौन है?

खुद मशाल बन तम से लड़ते

दिखता कौन है?

























ये शहर



धूल के गुबारों में अब,

नज़र नहीं आता है,

न जाने इससे आगे ये,

शहर अब कहाँ जाता है?

सांस लेना भी दूभर है इस शहर में अब तो,

धुंआ भी साँसों से सहन नहीं हो पाता है ,

न जाने इससे आगे ये शहर अब कहाँ जाता है?

घरों में कैद रहें हम ये नियति स्वीकार कैसे हो?

हवा ही दूषित, गांधी का सपना साकार कैसे हो?
नयी दुनिया के प्रथम दो दशक ही भयावह इतने,

आधुनिकता जीवन का मजबूत आधार कैसे हो?

सब कुछ भयानक सपनों सा अब नज़र आता है,

न जाने इससे आगे ये शहर अब कहाँ जाता है?



गाँव छोड़ कर जब हम शहर में आ गये,

अंधी दौड़ में अपना चैन सुकून तक गंवा गये,

नित नये रोग नयी व्यथाएं मुफ्त मिली, न जाने कब,

अंधेरों से लड़ते हुए हम उजालों को खा गये?

प्रकृति का सबक आसानी से समझ नहीं आता है,

न जाने इससे आगे ये शहर अब कहाँ जाता है?


क्या अपने बच्चों को बददिमागी उपहार देंगे?

प्रदूषित हवा, बीमार धरा पर नया संसार देंगे?

कमियां अपने जीवन में ही सुधार करें, न मालूम फिर

कैसे वो अपने जीवन को नया आकार देंगे?

नयी सभ्यता का दुखद अंत नज़र आता है,

न जाने इससे आगे ये शहर अब कहाँ जाता है?















ज़िन्दगी लौट आया हूँ मैं



तू गिरा ताश के पत्तों सा,

नर्क बना दे ये जीवन,

पर मैं न कर पाउँगा खुद को,

तेरे सम्मुख यूँ अर्पण,

तूने बस जन्म दिया है पर,

मैंने सीखा है सब खुद से,

तुझसे ही था ये मर्म मिला,

मैं हूँ यहाँ बेहतर सबसे,

आज तेरे प्रपंच की सब,

दीवार तोड़ आया हूँ मैं,

कर न दो दो हाथ कि,

ज़िन्दगी लौट आया हूँ मैं|



क्या समझ के बैठी है मुझको,

एक बात मैं समझा दूँ तुझको,

मैं नहीं खिलाड़ी कच्चा अब,

जीकर मैं दिखाऊंगा तुझको,

तोडूंगा तेरा आज मैं भ्रम,

विश्वास अटल मेरा खुदपर,

रोया हूँ अगर मैं आज तू सुन,

कल लोग हंसेंगे सब तुझपर,

बस ये ही अभिमान तेरा,

एक बार तोड़ने आया हूँ मैं,

कर न दो दो हाथ कि,

ज़िन्दगी लौट आया हूँ मैं|



वो होंगे अलग डरने वाले,

संघर्ष मेरा कहानी सा है,

मेरी तकलीफें भी हैं उपमा,

जलती रेत में पानी सा है

तू रहने दे तेरे बस का नहीं,

मुझे झुकाना अब आसान कहाँ,

मैं झुक जाऊं फिर मेरी जिद को,

रहेगा मुझ पर गुमान कहाँ?

ये सच है तेरे दरवाज़े पर बस,

पैग़ाम छोड़ने आया हूँ मैं,

कर न दो दो हाथ कि,

ज़िन्दगी लौट आया हूँ मैं































मुफ़लिसी



पावों में छाले पड़े,

फिर भी वो चलता रहा,

दो वक़्त रोटी के लिए,

मजबूर खुद पिसता रहा|



आज फिर घर कैसे,

खाली हाथ वो जाएगा यूँ,

सोच कर वो भूख को,

मन ही मन सिसकता रहा|



हाथ खाली जेब खाली,

खाली सब बर्तन भी हैं,

हाड़तोड़ मेहनत मगर वो,

जाने क्यों करता रहा?



नमक रोटी और सड़क पर,

उसने बिता दी ज़िन्दगी,

इन तीनों का कर्ज़ ही,

ता-उम्र वो भरता रहा|



धूप में है पैर काले हाथ मैले,

चेहरा जैसे बुझ गया,

खैनी में अमृत मिला बस,

चाहे जब मलता रहा|



कुछ गरीबी कुछ अमीरी,

खेल सब बचपन के हैं,

चंद सिक्कों के लिए,

वो चाल पर चलता रहा|



अंत भी तो विकट है,

पर निकट हो ये तय नहीं,

अस्पतालों के फर्श पर,

दिन मगर गिनता रहा |

हाल था बदहाल उसका,

जंग पर हर रोज़ थी ,

हाथ की लकीरों से भी,

पर मौत तक लड़ता रहा|































ख्वाहिश रहती थी



एक ख्वाहिश रहती थी,

कोई मेरी तरह मुझे जाने,

हद भूल कर किसी भी बंधन की,

मेरा अंतर्मन पहचाने

दूर भले हो लेकिन हर पल

पास रहे मेरे साथ रहे,

कोई हो जिसकी बाहों में,

बिन जाए दिल ना माने,

एक ख्वाहिश रहती थी,

कोई मेरी तरह मुझे जाने|



जब आँखें थक सी जाए,

जब चेहरा मुरझा जाए,

जब धड़कन धीमे से चले,

और साँसे मद्धम आएं,

बस वो एक हो जिसके

हाथों में हाथ समाये,

जिसके साथ बिताऊं मैं,

महीने साल ज़माने,

एक ख्वाहिश रहती थी,

कोई मेरी तरह मुझे जाने|



धूप छांव सब संग सहे,

हरपल मेरे संग जिए,

राह भटक मैं जाऊं जब,

हमसफ़र बन संग चले,

कोई तो हो जिसके आगे

सर खुद ही झुक जाए,

उसको मैं जितना चाहूँ

वो मुझको भी पहचाने,

एक ख्वाहिश रहती थी

कोई मेरी तरह मुझे जाने







शाम का वादा



वहां नहीं जहाँ रौशनियाँ

आँखों को चुभने लगे,

वहां नहीं जहाँ शोर से,

सर भी दुखने लगे,

वहां भी नहीं जहाँ हजारों

नज़रें आरती उतारती सी मिलें,

वहां भी नहीं जहाँ हरकतें,

ज़रा भी बनावटी सी लगें,

ये इश्क का ज़ोर है वरना दूर,

रहने का भी इरादा था अपना,

एक खूबसूरत सी शाम को,

मिलने का वादा था अपना|



हमें मिलना चाहिए दूर,

कहीं किसी मैदान में,

किसी नदी के किनारे पर,

या खुले आसमान में,

किसी मुकाम तक जाने की,

बेकरारी भी न हो हममें,

बचपना भी हो मगर थोड़ी,

समझदारी भी हो हममें,

कभी ये न लगे कि इश्क,

कम या ज्यादा था अपना,

एक खूबसूरत सी शाम को,

मिलने का वादा था अपना|



जब सूरज खुद ढलने से भी,

बेपरवाह हो जाने लगेगा,

ये सच है हमारा व्यक्तित्व,

एक दूजे में नज़र आने लगेगा,

ढूंढते रहेंगे लोग हर जगह,

हमारी तलाश किया करेंगे,

एक दूसरे में खुश रहकर हम

सबको नज़रंदाज़ किया करेंगे,

हम तो मिलेंगे इस तरह जैसे,

इश्क आधा आधा था अपना,

एक खूबसूरत सी शाम को,

मिलने का वादा था अपना|
































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