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Excerpt for तेरे आने की उम्मीद (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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तेरे आने की उम्मीद

(काव्य संग्रह)







लेखिका

पिंकी कुमारी बागमार











पिंकी कुमारी बागमार

9475004249/8250362022 pinkibaghmar@gmail.com

शिक्षा: एम. (हिंदी साहित्य) .बी.एड, पी-एच.डी शोधरत

पता: केशरीपुत्र भवन, मलिंचा रोड, ..-453/376, वार्ड-9

खड़गपुर, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर















रुक जा

रुक जा दो पल के लिए ही सही पर आज तू रुक जा

रो लेने दे मुझे तेरे कांधे में सर रखकर

तू आज फिर मेरा हमदम बन जा

ना रोक मेरे आंसूओं को .

बह जाने दे इसे

तू बस मेरी इन नजरो में खो जा

थाम ले एक बार फिर से इन हाथों को ,

जो छोड़ा था तुने ज़माने के डर से

थाम के इन हाथों को तू ,फिर से अपनी महोब्बत को जिंदा कर जा

बन जाने दे गवाह इन वादियों को ,हमारी महोब्बत का

तू मेरी जिन्दगी की सुनी फ़िजा में फिर से बहार लेकर आ

एक कसक से उठती है इस दिल में

आँखों में आंसूओं का शैलाब उमड़ आता है

मैं टूट सी जाती हूँ तुझे याद करके

तू मुझे संभालने के लिए रुक जा

रुक जा दो पल के लिए ही सही

पर आज तू रुक जा





































औरत



कराया गया मुझे अछूत होने का अहसास

जब कहा गया मुझसे तू...तू तो है एक औरत जात

पैदा तो हुई थी बस मैं एक औरत के रूप में

पर कर दिया इस समाज ने मुझे रुढिवादिता में जब्त

और बना दी मेरी औरत जात |

आगे पढना है मुझे...आगे बढ़ना है मुझे

पर हर कदम पे रोकना चाहता है मुझे ये समाज

कहता है क्या करेगी आगे पढ़ कर

तू..तू तो है एक औरत जात |



रिश्ते की बात छिड़ी जब मेरी

कई लड़के मुझे देखने आए

किसी ने मुझे न पसंद किया

तो किसी ने मेरी संपत्ति को पसंद किया

बिहा दी गई मैं उसके साथ

मेरी पसंद की नहीं थी कोई बिसात

क्यों? क्योंकि बना दिया इस समाज ने मुझे बस एक औरत जात |

लुटती है जब आबरू मेरी,शर्मिंदा भी होती मैं

ताने भी सुनती मैं,और बंदिशों में बाँध दी जाती मैं

और खुले आम घूमता है मेरी इज्जत को तार-तार करने वाला वो हैवान

देने की जगह गुनहेगार को सजा

देश के नेता सिखाने लगते हैं औरत को कपड़े पहनने का सलीका

क्यों? क्योंकि वह है पुरुष और मैं हूँ एक औरत जात ?

पैदा होते ही माँ-पिता के हिसाब से जिन्दगी जी मैने

ये खाओ,ये पहनो,ऐसे मत चलो ,ऐसे मत बात करो ,ऐसे मत हंसो,

बड़ी होते ही भाई के हिसाब से जिन्दगी जी

वहाँ मत जाना ,ऐसे कपड़े मत पहनना ,ज्यादा किसी से बात न करना

शादी हुई तो पति के हिसाब से जिन्दगी जी मैने

उनकी इच्छाओं में खुद को ढाल ली मैं

पर इन सबकी जिन्दगी जीते-जीते खुद को खो दी मैं

क्यों ? क्योंकि समाज की नज़रों में मैं हूँ बस एक औरत जात |



आखिर कब तक औरत को ‘औरत जात’ नाम की बेड़ियों में बाँध के रखेगा ये समाज

आखिर कब तक औरतो के सपनों को कुचलते रहगा परम्पराओं के नाम पर ये समाज

आखिर कब औरत के अस्तित्व को समझेगा ये समाज ?

कब इस पुरुष प्रधान समाज के समझ में आएगी समानता की बात ?

कब समझेगा ये समाज की स्त्री पुरुष दोनों के अधिकार है समान

कब? आखिर कब?

नहीं बंधना औरत जात की बेड़ियों में मुझे

मैं बस एक औरत हूँ ...सबकी तरह एक आम इंसान

मुझे औरत ही रहने दो ...मत बनाओं मुझे खुद से अलग कर मेरी कोई जात













किसान



कड़ी धुप हो या तेज बारिस

जाड़े की शर्दी हो या गर्मी की बहती लू

वो रुकता नहीं ,

चलाता जाता है वो हल

नंगे पाओं ,अर्धंनग्न बदन में

हर मौसम की मार सहता

वह बोता है अन्न |

सिचता है वो अपने खून-पसीने से अपनी खेती को

बोता है वो अपनी मेहनत से

,देश के हर जाने-अन्जाने व्यक्ति के लिए अन्न

लिखता है वो लोगों की कामयाबी

बैठ कर अपनी टूटी झोपड़ी से

बदले में उसे मिलती है बस क़र्ज़ की मार ,बेबसी,

खाने के लिए सुखी-रोटी, नमक

जिसका सिंचा हुआ खा कर देश चढ़ता है कामयाबी की सीढी

वही मजबूर हो जाता है अंत में क़र्ज़ के बोझ से दब कर आत्महत्या करने को |

अन्न दाता किसान ..

आज तरश रहा है अपने आंगन की हरयाली को |































हिन्दी हैं हम

हिन्दी हैं हम राष्ट्र भाषा हिन्दी है हमारी

हिन्दी अभिमान है हिन्दी ही पहचान है हमारी।।

लेकिन ये मेरे देश को आज क्या हो रहा है,

पश्चिमी भाषा में जैसे देश कहीं खो रहा है।

भारत के हर कार्यालयों में आज अंग्रेजी का ही बोलबाला है।

हिन्दी अपना अस्तित्व कहीं खो रही है।।

ये मेरे देश को आज क्या हो रहा है ....

हमारे देश के नेता, बड़े शान से खुद को हिन्दी वाला बतलाते हैं।

पर जब भाषण देने आते हैं, अंग्रेजी में ही सुनाते हैं।।

आज की युवा पीढ़ी, हिन्दी बोलने में शर्माती है।

अंग्रेजी बोल कर ही वह खुद को सम्पन्न पाती है।।

माँ आज माँ नहीं, मॉम से जानी जाती है।

पिता भी अब पिता नहीं रहे, अब वे डैड कहलाते हैं।।

ये मेरे देश को आज क्या हो रहा है ...

अपनी ही भाषा से लोगों को कैसा बैर हो रहा है ?

हिंदी अपना अस्तित्व कहीं खो रही है।

ये मेरे देश को आज क्या हो रहा है ....





































सावन



आया सावन का मौसम

डाल-डाल में झूले डल गये

झूल रही है सखियाँ सारी

गा रही सावन के गीत

निकल पड़े हैं कावडिया लेकर जल

करने अपने शिव का जलाभिषेक |



माँग रहें हैं किसान मुरादे

की इस सावन ऐ बारिस

तू मेरे खेत में भी हरियाली दे |



हर चमन में फूल खिल गये

कलियाँ भी मुस्कुराने लगी इस सावन को देख

बागवान के चेहरे भी खिल उठे

हँसते महकते अपने चमन को देख |



महक उठी धरती सौंधी-सौंधी

लहरा उठे फसल हर खेत

गा रहे पंक्षी डाली-डाली

की आया सावन झूम के |































सुबह



ऐ सुबह आज फिर मुस्कूराना 

सुबह की खिलखिलाती धुप की तरह  

मेरे चहेरे में आज चमक लाना 

बाग में खिले फूलो की तरह जिंदगी को महकाना 

किसी की दुआ ,मुस्कान बन के  अधरो पर सज जाना.................























ऐसा मुकद्दर दे मेरे खुदा



उसकी कविता में ढल जाऊं

 उसके लबो की मुस्कान बन जाऊं 

ऐसा मुकद्दर दे मेरे खुदा 

खास हो जाऊं मैं उसके लिए 

उसकी खुशियों की मैं पहचान बन जाऊं...

जब लिखे वो कविता

उसका तसव्वुर बन जाऊं

अपनी उल्फत से उसकी जिन्दगी सजाऊँ ..

ऐसा मुकद्दर दे मेरा खुदा

उसकी खुशियों की मैं पहचान बन जाऊं|

जब चले वो कठिन राहों में तब उसके कदम से कदम मिलाऊ

उसके राश्ते में आने वाले हर कांटो को मैं अपने हाथों से हटाऊँ

ऐसा मुकद्दर दे मेरे खुदा

तपती धुप में मैं उसकी छावं बन जाऊं|





उसके सिवा कुछ मांगा नहीं



हमने उसके सिवा कभी कुछ और खुदा से मांगा नहीं

पर आँसूओं के सिवा

कभी कुछ और हमारे हिस्से आया नहीं

रोती आँखें हर पल यही सवाल करती है

गलती क्या थी हमारी?

जो उसने हमें कभी अपना बनाया नहीं.......



















वो लड़की



चेहरे पे लगाए लाली ,आँखों में लगाए काजल

वो सबके बीच मुस्कुरा रही थी

चेहरे में एक दर्द छिपा था उसके

जिसे वो लड़की अपने मुखौटे से छिपा रही थी



छिपा कर अपने दर्द को वो

सबको अपने अलग-अलग नृत्य से लुभा रही थी ,

लग रहा था उसे देख की

वो लड़की अपनी गरीबी से मजबूर होकर ही इस कृत्य को अपना रही थी



बारह-तेरह साल की उम्र ही थी उसकी

अपने बचपन को भूल वह ,

अपना और अपनों की भूख मिटाने के लिए ही इस दर्द को उठा रही थी

कपड़े कुछ फटे,कुछ मैले से थे उसके

एक उम्मीद लिए वो सबके सामने हाथ बड़ा रही थी



हंस रहे थे लोग उसके सजे चेहरे को देख

पर उसकी दर्द भरी आँखों की ओर

किसी की नज़र नहीं जा रही थी |





























तसव्वुर



तसव्वुर में जब भी तू आता है

मेरी आँखों में गुलाबी सपने

लबों में मुस्कान भर जाता है |

होता है जब भी तू रूबरू मेरे

तेरी इबादत में मेरा सर झुक जाता है |

मेरे रूह की तू मंजिल

मेरी साँसों की तू ड़ोर

तू है तो मैं हूँ

तेरे सिवा न मेरा कोई और|

















हर फूल अब बेरंग नज़र आते हैं



हर फूल अब बेरंग नज़र आते हैं

ठंडी हवाओं के झोके जब छुते हैं मुझे

तेरे दिए जख्म और भी गहरे हो जाते हैं |

अब कोई सपने नहीं सजते इन आँखों में

बस बारिस की बूंदों की तरह

इन आँखों में आसुओं के सैलाब उमड़ आते हैं |

खुशियाँ जैसे कहीं गुम सी हो गई मेरी

अब तो बस दिल में उठ रही कसक को सहे जाते हैं |

अब किसी पर ऐतबार नहीं कर पाता ये दिल

फिर से कहीं टूट न जाए

ये सोचकर डर जाते हैं |













दर्द



हाय इस दर्द ने मुझे कितना रुला दिया

संभालना चाह लाख खुद को मैने

पर इस दर्द से ही सामना हुआ |

मुस्कुराते थे ये लब भी कभी मेरे

पर इन आंसुओं ने मेरी मुस्कान से मुझे अंजान बना दिया

गुनगुनाते थे ये होठ कभी मेरे

पर इस दर्द ने इसे गुमसुम बना दिया |

सुख चुके हैं इन आँखों के आसूं भी अब तो रोते-रोते

पर इस दर्द ने दिल में आंसुओं का दरिया बना दिया ,

निकलना चाह जब भी इस दर्द से बाहर तो ग़मों के बादल ने

मुझे वापस इस दरिया पर ला खड़ा किया |













विश्वास



विश्वास बस एक शब्द नहीं

ये जीवन की सच्चाई है


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(Pages 1-23 show above.)