Excerpt for छेड़ दो तार (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



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प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043





सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN




कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ






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छेड़ दो तार

(काव्य संग्रह)







लेखक

मनोज कुमारमंजू





मनोज कुमारमंजू

9719469899

पिता: श्री छेदालालशिक्षक

माता: श्रीमती रामा देवी

पता: अयोध्या-सदन, इकहरा, बरनाहल, मैनपुरी ( प्र)





















छेड़ दो तार



छेड़ दो तार वीणा के हे शारदे

मन में दीपक प्रभा का दमकने लगे

खिल उठें सारी कलियाँ

पवन झूम ले

गुन गुनायें ये पंक्षी

गगन चूम ले

प्यार ही प्यार हो

हर दिशाओं में अब

भूल जायें सभी

दुश्मनी दिल से अब

खोल दो सारे पट आज तुम ज्ञान के

छेड़ दो तार वीणा के हे शारदे

मानसिक बल मिले

ऐसे हों सिलसिले

प्रगति की राह पर

सारा ये जग चले

तोड़ दें ऊँच नीची

ये बन्धन लड़ी

आज खुल जाए नफरत की

हर हथकड़ी

तेरी करुणा का सागर छलकने लगे

छेड़ दो तार वीणा के हे शारदे

मन में दीपक प्रभा का दमकने लगे

छेड़ दो तार वीणा के...





















माँ तो माँ है



माँ तो माँ है माँ सा कौन

हर दुख सहती रहकर मौन

जिसकी आशाओं का दीपक मुझमें ही अब जलता है

जिसकी आंखों का हर सपना मेरी आंख में पलता है

नहीं पूजता मंदिर मस्जिद न टेकूं गुरुद्वारे को

कदमों में बस झुक जाता हूं जब भी निकलूं द्वारे को

न मैं पढ़ता रामायण न सीखा है गीता का सार

माँ  की आंखों से दुनिया को पढ़ लेता हूं बारम्बार

उसके आंचल में बसते हैं दुनिया के ये चारों धाम

माँ तो माँ है माँ सा कौन हर दुख सहती रहकर मौन

जिसके कारण दृग खोले इस दुनिया में मैं आया हूं

जिसके आंचल ने सींचा तब दो पग चलने पाया हूं

उस जननी के त्यागों का कैसे मैं मोल चुकाऊंगा

उसका हो अपमान अगर तो जीते जी मर जाऊंगा

न मैं फेरूं मनका मनका न जपता मैं प्रभु का नाम

मैं तो बस रटता रहता हूं अपनी मां का प्यारा नाम

माँ रोये तो इस जग में फिर बोलो सुखी रहा है कौन

माँ तो माँ है माँ सा कौन हर दुख सहती रहकर मौन

































ये मातृभूमि है वीरों की



ये मातृभूमि है वीरों की, पर अब वो खून न मिलते हैं

तब मिट्टी में तपते बचपन, अब छुई-मुई से लगते हैं

वो बचपन थे जो खेल-खेल में, जबड़े फाड़ दिया करते

आजादी के दीवाने कोड़ों की मार सहा करते

जिज्ञासा वश जो अश्वमेघ घोड़े को बाँध लिया करते

वो बचपन थे जो खेतों में बंदूकें बोया करते

हौसले पस्त, कोई न लक्ष्य, सब अंधकार में डूबे हैं

क्रोधी, कपटी और निर्लज्ज, जाने कैसे मंसूबे हैं?

भारत माँ का वो मधुर स्वप्न, कैसे पूरा हो पायेगा?

सोचो कैसे ये देश मेरा, फिर विश्व गुरु कहलायेगा?

कैसे फैलेगी संस्कृतियाँ? फिर से स्वराज कब आयेगा?

क्या इन्हीं भविष्यों के दम पर, भारत स्वतंत्र रह पायेगा?

ये वीरों की है मातृभूमि, वीरों का मान न जाने दो

खुल जाने दो अब हृदय पटल, थोड़ा बदलाव तो आने दो





मैं अकेला



मैं अकेला ही शिखर तक जा रहा हूँ

साथ मेरे तुम चलो या न चलो

ढूँढ़ लूँगा मंजिलें तुम देखना

हम सफ़र मेरे बनो या न बनो

मानता हूँ ये सफ़र मुश्किल सफ़र

अनगिनत रुश्वाइयों का है जहर

पर रुका जो, फिर कभी वो न बढ़ा

वक्त ये लेकिन फिसलता जा रहा

मेरी फितरत, मैं मिला दूँ उस गगन से ये धरा

हौसले ऐसे मैं पानी से दिए की लौ जला दूँ

ये बबंडर के प्रथम की चुप्पियाँ हैं

जलजला बनकर, पर्वतों को हिला दूँ









कब तलक?



कब तलक सहना पड़ेगा इन धमाकों का कहर

कब तलक हिंसा से सहमे गाँव हो या हो शहर



बेगुनाहों का लहू कब तक बहाने के लिए

कब तलक फौजी हमारा बस निशाने के लिए



हाथ बाँधे कब तलक बैठे रहोगे मौन यूँ


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