Excerpt for सबरनाखा by , available in its entirety at Smashwords



लेखक/संपादक मित्रों के लिए सुनहरा अवसर!!!

ईबुक प्रकाशन ISBN नंबर के साथ (बिना किसी लागत के)

अगर कोई लेखक/संपादक बिना किसी लागत के अपनी ईबुक प्रकाशित करवाना चाहते हैं, तो अपनी पाण्डुलिपि वर्ड फाइल में sonylalit@gmail.com पर भेजें।

भाषा: ईबुक हिंदी, इंग्लिश, भोजपुरी, मैथिली इत्यादि रोमन या देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली किसी भी भाषा में प्रकाशित करवाई जा सकती है।

ईबुक गूगल बुक, गूगल प्ले स्टोर और अमेज़न में प्रकाशित की जाएगी। पाण्डुलिपि भेजने से पूर्व निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान दें:

महत्वपूर्ण एवं ध्यान देने योग्य बिंदु:

1. पाण्डुलिपि वर्ड फाइल में भेजें

2. फॉण्ट यूनिकोड/मंगल होना चाहिए

3. पाण्डुलिपि के साथ फोटो और संक्षिप्त परिचय भी अवश्य भेजें

4. भेजने से पूर्व अशुद्धि अवश्य जाँच लें

5. ईमेल में इसकी उद्घोषणा करें कि उनकी रचना मौलिक है और किसी भी तरह के कॉपीराइट विवाद के लिए वे जिम्मेवार होंगे।



रॉयल्टी: रॉयल्टी 70% प्रदान की जाएगी (नोट: पुस्तक की पहली 10 प्रति की बिक्री का लाभ प्रकाशक का होगा। 11वीं प्रति की बिक्री से लेखक और संपादक को रॉयल्टी मिलनी शुरू होगी। बाकि रॉयल्टी का प्रतिशत वही रहेगा अर्थात 70% लेखक का और 30% प्रकाशक का।



अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: ललित नारायण मिश्र (वर्जिन साहित्यपीठ) 9868429241



प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - मई 2018
ISBN


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


कॉपीराइट

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सबरनाखा

(काव्य संग्रह)







लेखक

चंद्रमोहन किस्कू









चंद्रमोहन किस्कू 

9732939088
Email-chandramohankisku1997@gmail.com

पिताबोरेन्द्र नाथ किस्कू 
माताबिमला किस्कू

पता: ग्राम - बेहड़ा, डाकघर - हल्दाजुड़ी, वाया-घाटशिला
जिला- पूर्वी सिंहभूम, झारखण्ड


सदस्य:

प्रगतिशील लेखक संघ

अखिल  भारतीय संताली लेखक संघ









अंतर्राष्ट्रीय  अध्यक्ष

Juwan Onoliya नामक संताली साहित्यिक संघ


पुस्तक प्रकाशित 

  • मुलुज लांदा (संताली कविता संग्रह, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली  से प्रकाशित)

  • फेसबुक (संताली कहानी संग्रह)























































शायद तुम्हारे लिए आनंद है



सप्ताह भर से
भूखे पेट हूँ
पेट के गड्ढे में
आग जल रही है
धू-धू कर
हुंह और बर्दास्त नहीं हो रहा है
सर के ऊपर तक
आग की लपटें उठ रही हैं

पेट के गड्ढे को भरने
जलती आग को
बुझाने के लिए
तुमसे कितना प्रार्थना किया
एक मुट्ठी भोजन के लिए
बार-बार गया तुम्हारे पास
पर तुम
बचे हुए भोजन को
अधखाया और जूठन को
मुझे देने में
तुम्हें नागवार लगा
गन्दी नाली में बहा दिया
कच्चे दूध को
पत्थर के देवता के माथे पर
डाल दिया
मीठी-मीठी पकवाने
देवताओं को सौंप दिया
शायद मन में विचार किया
मैं तुम्हारे बराबर का नहीं हूँ
दो पैरवाला जानवर हूँ
इसलिए मेरा भूख से मुरझाना
भूख से मर जाना
तुम्हें आनंद दे रहा है


















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