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Excerpt for Veeransh : Veer Ki Kalam Se by , available in its entirety at Smashwords

भूमिका

वीरेंद्र शिवहरे या ‘वीर’ जैसा के हम उन्हें जानते हैं सिर्फ़ एक शायर

या लेखक ही नहीं हैं, एक विचारक हैं| एक गहरी सोच का मालिक

जो ज़िंदगी के हर पहलू को गौर से देखता है और समझने की कोशिश

करता है|

वीर की शायरी कोई खानदानी विरासत नहीं है बल्कि उनके अपने

तज़ुर्बे और इल्म का नतीजा है| वो जो महसूस करते हैं उसे अपने

लफ़्ज़ों में बयां करने की कोशिश करते हैं| जैसा के अपनी ग़ज़ल

एक-एक रुपया’ में वो खुद कहते हैं के,

न खैरात में मिला है न वसीयत काम आई है

एक एक रुपया मेरी जेब का गाढ़े पसीने की कमाई है|

और शायद इसीलि ए उनकी इस दौलत से हर लम्हे के लि ए कोई

न कोई शेर या मिसरा निकल ही आता है| पेशे से सॉफ्टवेयर से

वास्ता रखने वाले वीर हर शेर में मानी और हर मानी में एक ग़ज़ल

ढूंढने का हुनर रखते हैं| शहर की कई महफ़िलों में शिरकत करने

वाले ये जाने-पहचाने शायर हैं|

शौकीनी शायरी के बावजूद उनकी ग़ज़लों में तकनीक का भरपूर

इस्तेमाल देखा जाता है| ग़ज़ल के मायने, उसके नि यम या मीटर

एक दूसरे के आगे नहीं आते| ख़याल भी कहते हैं तो ग़ज़ल की शान

में कोई गुस्ता खी की गुंजाईश नहीं छोड़ते| ये उसूल उनके हर मिसरे

में बक़ायदा देखा जा सकता है|

दोस्तों के दोस्त और दुश्मनों के भी दोस्त ‘वीर’ रूमानी भी हैं, दाना

भी हैं, कहीं वाइज़ हैं तो कहीं पशेमान भी दि खाई देते हैं| उनकी

नज़्म ‘सादगी घुमा दी माँ मैंने’ में उनकी मासूमियत झलकती है|

हर शख्स के हाथ में’ ग़ज़ल में वो दुनि याबी ज़रूरतों में उलझे ज़हन

की दुहाई देते हैं, तो दूसरी ग़ज़ल ‘इजाज़त’ में वाईज़ बनकर वो दिल की

दलील देते भी सुनाई देते हैं|

उनकी शायरी अब उस मक़ाम पर आ चुकी है जहाँ वो लोगों के

सामने पेश हो कर उनकी मोहब्बत और तनक़ीद को क़बूल करे|

करीब ५०० से ज़्या दा ग़ज़लें लिख लेने के बाद वीरेंद्र शिवहरे की

ग़ज़लों का ये पहला संकलन है और उनकी इस हिम्मत के लिए उन्हें

बहुत मुबारक़| उम्मीद करते है के वीर के इस पहले संकलन का आप

तह--दिल से इस्तकबाल करेंगे|

- दिवस गुप्ता

कविता

आँखें खोल कर देख!

सादगी घुमा दी

एक आईना जो बोलता है

फीकी बात

तुम आज की बात करो

सावन मेरे

कोई धार तो मुझे बहा ले!

अधिकार नहीं मिलता

मैं

तेरी मामूली सी बातों में

खोया मौसम

बातों ही बातों में

तुम रोना मत

तुम सब कुछ तो जानते हो

एक और दिन

सभी की तरह

शब्दों का मदारी

नज़र का फेर है प्यारे

नज़्म

आमद

एक पिटारा लाया हूँ

स्याही के धब्बे

मैं इनका ख़ुदा हूँ

घर को जाता हूँ

बेवफ़ा मैं

तेरी सादगी

साथ हूँ तुम्हा रे

लंगड़ा वक़्त

एक दिल है

तलाश

आग

सवालों से मुलाक़ात हुई

ग़ज़ल

एक-एक रुपया मेरी जेब का

जिसकी इजाज़त दिल न दे

हर शख्स के हाथ में कटोरा है!

मोहब्बत कम से होती है

वक़्त मुख़्तसर है

निभा रहा था अब तलक

अच्छा लगता है...

तराशा हुआ पत्थर हूँ

इंतज़ाम

खाली हाथों में

तुम पर जचता नहीं

तन्हा जाम

लफ़्ज़ों में तेरी बात

इल्ज़ाम तूफानों पर आता रहा

दिल बहुत ज़लील हुआ

अपने अंदर की आग

मुश्कि ल वक़्त

चंद लम्हों को

रोज़ देखता हूँ!

अंगार ढूँढता हूँ

नहीं देखी जाती

चांदनी का डर

कुछ ख़्वाब न देखें

नींद का सौदा

अब भीगेंगे सावन में

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में

हासिल के दायरे

ताक़त बहुत चाहिए

छोड़ दिया है

याद है मुझको

फ़िराक से पहले

पहुँचते - पहुँचते

अपने कई रास्तों में भटका हुआ

मैं कहीं भी पहुँचा बस बेकार पहुँचा

इंतज़ार की घड़ी

तुम और मैं

खींच लाया हूँ

ज़िंदगी को चख कर देखा

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं

ज़िंदगी रूठी हुई

पैरों में तेरे बेड़ियाँ हैं

समझाया न करो

फिर रहे हैं

एक आग है मेरे अंदर

पसंद

वक़्त से पहले

शर्त

ज़रूरी

इस शहर की दुकानों में

ये तुम ही हो के मुझे वहम हुआ है

क्या बतायें के हाल कैसा है

इन दिनों

गुज़रा

सीने से लगा

मौला

मेरी इस ज़िद ने

तुम्हें भी प्यार हो जाता

आज आपकी कमी बहुत खल रही है

सपने टूटते हैं

नादां

मैं हुंकार लेकर

ज़िंदगी की सौगात

एक सौदा अपनी पूरी क़ीमत का

फि र से

बुलंद हौसले राह--मंज़ि ल को

तेरे सिवा अब कोई नहीं

थोड़ा फ़ासला ज़रूरी है

दिल से दिल की बात नहीं होती

बर्दाश्त नहीं होती

ख़यालों के हुजूम से

ज़िंदगी खूबसूरत है

इश्क़ की गहराईयों में

मेरा सुख़न

तन्हा हम तेरे बिन

ख़ुद से बेईमान माना

पहचान तो हो

अक्सर

पूरी कहाँ होगी हसरत तुम्हारी

ना मौका दिया सफ़ाई का

जब कभी तू मुझे बहुत याद आता है

मंज़िलों को ख़बर कर दो

ज़ुबां आखिर ज़ुबां है

बेरुखी--गुल

हम ख़ुद के साथ खेले बहुत हैं

जो मेरा हौसला है और मेरा डर भी

पथराई आँखों को अब ख़्वाब ना दे

मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में

जाने क्या सोच कर रोज़ घर जाता हूँ

साथ तो हैं मगर जुदा हैं हम

नज़र से गिराने का क्या फ़ायदा

किस मसीहा को बचाया जाए

खिज़ा

हश्र--जवानी

तो बेहतर होता

आसां नहीं था

छुपायें तो छुपायें कैसे

सूखे अश्कों के दाग

बिछड़ा यार नहीं मिलता

तारीफ़--ग़ज़ल

तुम्हारे लिए

फ़ासले ख़ुद से ख़ुद के

हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है

किताब बना लूँ

कविता

आँखें खोल कर देख!

ज़हन से ख़याल झाड़ कर देख,

डर की आँखों में झाँक कर देख|

ज़िंदगी से ख़ुद को मांग कर देख,

अपने वजूद को पहचान कर देख|

लम्हे को कभी बाँध कर देख,

वक़्त के दरिया को थाम कर देख|

हदों की सरहद को लाँघ कर देख,

हिम्मत को सर पर बाँध कर देख|

सवालों से ख़ुद को नि काल कर देख,

चिंताओं को कल पर टाल कर देख|

ख़्वाहिशों के तारों को डुबा कर देख,

हसरतों के अब्र को गला कर देख|

ज़रूरतों से आगे ज़रा जा कर देख,

ख़ुशियों से परे कुछ पा कर देख|

एक दिन को मज़हब भुला कर देख,

अपने अंदर ख़ुदा को बुला कर देख|

ज़िम्मेदारियों की ज़ंजीर तोड़ कर देख,

तू ख़ुद अपने से रिश्ता जोड़ कर देख|

आँखों से अश्क बहा कर देख,

ग़म की इन्ति हा तक जा कर देख|

गड़े मुर्दों को उखाड़ कर देख,

माज़ी के पन्नों को फाड़ कर देख|

समाज के नज़रिये को हटा कर देख,

तू आँखों को दुनि या पर गाढ़ कर देख|

आँखें खोल कर देख!

सादगी गुमा दी

सादगी गुमा दी माँ मैंने,

ज़िंदगी उलझा ली माँ मैंने|

मिली ना सुकून की बूंद तो,

आँख अपनी भिगा ली माँ मैंने|

तू कहती थी हौसला रख हमेशा,

देख उम्मीद की लौ बुझा दी माँ मैंने|

बनाता था कभी कागज़ से कश्तियाँ,

देख सारी कश्तियाँ डुबा दी माँ मैंने|

आज तू भी अपने दुलारे से दूर है,

और दूरियाँ और भी बढ़ा दी माँ मैंने|

आज अपने चेहरे पे ख़ाक लेपकर,

अपनी होली मना ली माँ मैंने|

एक आईना जो बोलता है

घर के एक कोने में बैठा,

निगाहों में वही तीर लिए,

यार जो यारी तोलता है,

एक आईना जो बोलता है|

हर दिन मैं बदल गया,

हर हाल में वो ढल गया|

वो ख़ुदा की तरह बुलंद है,

न हँसता है, न रोता है,

एक आईना जो बोलता है|

मेरे उसूल खोखले हो गए,

सपनों के फूल, कांटे बो गए|

चला था काफ़ि ला लेके,

साथी राहों में कहाँ खो गए..

वहीं लटका क्या सोचता है,

एक आईना जो बोलता है|

सुबह उसकी आँखों में खोजता,

नए मायने ज़िंदगी के|

शाम जिसकी बाँहों में ढूँढता,

नए जवाब ज़िंदगी के|

तन्हाईयों में,

चुपके से क्या कहता है,

एक आईना जो बोलता है|

फीकी बात

गहरी बात, तीखी बात,

करते हो तुम फीकी बात|

क्या इनमें कुछ है तुम्हारा,

या बोल रहे हो सीखी बात|

मोड़ दिए फिर बेजान लफ़्ज़ ,

करते क्यों नहीं सीधी बात|

रूखे मुँह से बोली तुमने,

जज़्बा त में भीगी बात|

तड़पते रहे हम उम्र भर,

दिल में रखकर बीती बात|

तुम कड़वे ही रहोगे 'वीर',

कहते क्यों नहीं मीठी बात|

तुम आज की बात करो

तुम आज की बात करो|

आज जो जुदा है कल से|

आज जो पहले कभी नहीं आया है|

आज जो फिर कभी नहीं आएगा|

यूँ न ज़ीस्त बर्बाद करो!

तुम आज की बात करो|

आज रात ने नया आफ़ताब बनाया है|

आज दिन ये नया महताब बनाएगा|

तुम भी कुछ नया, कुछ मुख़्तलिफ़ करो|

यूँ न ज़ीस्त बर्बाद करो!

तुम आज की बात करो|

आज अपनी सलाख़ों को तोड़ दो|

आज अपनी हिम्मत की बात सुनो|

आज ही सब कुछ का हासिल है,|

आज से आँखें चार करो|

यूँ न ज़ीस्त बर्बाद करो!

तुम आज की बात करो|

सावन मेरे

लौटे नहीं हैं परदेस से साजन मेरे,

तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे|

अब आये हो तो दर पर ही रुकना,

पाँव ना रखना तुम आँगन मेरे|

तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे...

तेरी ये गड़गड़ा हट, तेरी ये अंगड़ाईयाँ,

इनसे मुख़्तलिफ़ नहीं हैं, मेरी ये तन्हा ईयाँ,

चाहे तो बहा ले, कुछ आँसू दामन मेरे|

तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे...

तेरी बूंदों से मेरी, तिश्नगी ना मिटेगी,

तेरी कोशिशों से, ये आग और बढ़ेगी|

तुझसे ना संभलेंगे अब तन मन मेरे|

तुम थोड़ी जल्दी ही आ गए सावन मेरे...

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले,

कब तक बैठूं नदी किनारे|

ऊब गया हूँ देख-देख कर,

बहता पानी, रुके किनारे|

विचारों का प्रवाह निरंतर,

मैं’ की खोज में भटकता अंतर|

या इस कंकड़ को जल बना ले,

या इस कंकड़ को तल बना ले|

कोई धार तो मुझे बहा ले,

कब तक बैठूं नदी किनारे..

मुट्ठी में क्षण नहीं समाता,

बहता समय है कहाँ तक जाता?

कौन प्रश्नों से उत्तर निकाले,

कौन ज्ञान की परिभाषा डाले!

कोई धार तो मुझे बहा ले,

कब तक बैठूं नदी किनारे...

कल-कल करती ध्वनि सुनता हूँ,

अतीत भविष्य के जाल बुनता हूँ|

पल-पल गिरता जो मुझे उठा ले,

एक पल ऐसा जो मुझे समा ले|

कोई धार तो मुझे बहा ले,

कब तक बैठूं नदी किनारे...

जन्म मृत्यु का खेल पुराना,

एक कण आना, एक कण जाना|

जीवन का क्या अर्थ निकाले,

इसे जैसा चाहे वैसा बना ले|

कोई धार तो मुझे बहा ले,

कब तक बैठूं नदी किनारे...

अधिकार नहीं मिलता

कहीं माँ का दुलार नहीं मिलता,

कहीं बाप का प्यार नहीं मिलता|

कुछ अभागी औलादें ऐसी भी हैं,

जिन्हें अपना अधिकार नहीं मिलता|

उम्र भर ढूंढते फिरते हैं बेगानों में,

मगर कोई तलबगार नहीं मिलता|

जैसे किसी वीरान पड़े मकान को,

बरसों किरायेदार नहीं मिलता|

मौत से एक लम्हे का भी,

किसी को उधार नहीं मिलता|

और अच्छी क़ीमत दे ज़िंदगी की,

ऐसा कोई साहूकार नहीं मिलता|

मैं

तन्हा हूँ,

अकेला नहीं हूँ मैं|

किसी का बहुत प्यारा हूँ,

सौतेला नहीं हूँ मैं|

किसी की आँखों का नूर हूँ,

किसी की ज़िंदगी का सुरूर हूँ|

ख़ुद बेबस हूँ तो क्या ,

किसी की मजबूरी नहीं हूँ मैं|

वक़्त के सितम,

जज्बात ने सहे,

भीगती पलकों ने,

कितने अफ़साने कहे|

ग़म के समंदर में हूँ,

अभी डूबा नहीं हूँ मैं|

किसी की सांसों में महकता हूँ मैं,

किसी के दिल में धड़कता हूँ मैं|

इस धूप में उनके दामन की छांव को,

भूला नहीं हूँ मैं|

अभी हैं और साँसें इस जिस्म में,

अभी हैं और सफ़र बाकी,

कुछ लम्हों से उदास हूँ,

अभी रोया नहीं हूँ मैं|

उन अकेली बातों में,

उन तन्हा रातों में|

नींदों में जला कर खवाबों को,

राख के साथ सोया बहुत हूँ मैं|

उनकी आँखों में ठहरा हुआ अश्क हूँ मैं,

जिसका इंतज़ार है उनको, वो शख्स हूँ मैं|

माना कि थक गया हूँ,

अभी टूटा नहीं हूँ मैं|

जीता है कोई जिन में तन्हा ,

उन लम्हों का गवाह हूँ सदा|

माना कि बि छड़ा हूँ यार से,

कस्मों को भूला नहीं हूँ मैं|

अभी हँसने गाने के दि न हैं तुम्हारे,

पर ये मत भूलो,

जिन सदमों का डर है तुम्हें,

उन सदमों से खेला बहुत हूँ मैं|

तेरी मामूली सी बातों में

तेरी मामूली सी बातों में,

नामामूली सा प्यार छुपा है |

ख़ामोश गहरी आँखों में,

मीठा सा इक़रार छुपा है |

न तुमने कोई कस्में दी,

न मैंने कोई अहद कि या |

मगर दोनों के दरमियाँ,

अनकहा सा ऐतबार छुपा है |

दो ज़िंदगियाँ वैसे तो,

हर लम्हा मुसलसल हैं |

दो दिलों में लेकिन,

ज़िंदगी सा इंतज़ार छुपा है |

खोया मौसम

ख़ुद से जब मैं सच्चा था,

दुनिया की नज़र में बच्चा था|

हासिल नहीं था बहुत ज़िंदगी से,

थोड़ा बहुत था, अच्छा था|

ख़ुद से जब मैं सच्चा था...

ग़म सजाना बचपन से अदा थी,

अक्लमंदों की समझ में, कच्चा था|

हौसले बुलंद हुआ करते थे,

इरादों का पक्का था|

ख़ुद से जब में सच्चा था...

मासूमियत थी चेहरे पर,

दिल में दर्द सबका था|

संभाल कर रखी थी दौलत मुट्ठी में,

किसी का दिया जो वो सिक्का था|

ख़ुद से जब मैं सच्चा था...


धूप खुशनुमा हुआ करती थी,

आँचल में उसने साये को जकड़ा था|

तुम आओ जो कभी तो दिल में बस जाना,

दिल का कोना तुम्हारे लिए रखा था|

ख़ुद से जब में सच्चा था ...

बातों ही बातों में

बातों ही बातों में,

कट गयी ज़िंदगी मेरी,

कितने रिश्तों में,

बंट गयी ज़िंदगी मेरी|

अपनी सुध थी

ना ज़माने की ख़बर,

इश्क़ के बाज़ार में,

लुट गयी ज़िंदगी मेरी|

कुछ वक़्त का तकाज़ा था,

कुछ हालात की मजबूरी,

हर रोज़ बदल गयी,

ये शख्सियत मेरी|

तुझे अपना कहूँ तो किस हक़ से 'वीर',

तेरी सांसों ने छीन ली ज़िंदगी मेरी|

तुम रोना मत

अपनी मजबूरियों पर,

दिलों की दूरियों पर,

रात की बेनूरियों पर,

तुम रोना मत|

अपनी तन्हाईयों पर,

माज़ी की परछाइयों पर,

ज़माने की नादानियों पर,

तुम रोना मत|

दिल की मायूसियों पर,

दर्द की ख़ामोशियों पर,

इन सांसों की बरबादियों पर,

तुम रोना मत|

तुम सब कुछ तो जानते हो

मेरे ज़बीं की शिकन,

मेरे लफ़्ज़ों की काँप,

मेरे झूठ की तड़प,

मेरे सच की आवाज़,

तुम सब पहचानते हो,

तुम सब कुछ तो जानते हो|

मेरे ग़म की रातें,

मेरे ज़हन की बातें,

मेरे दर्द की सिसकी,

मेरे हद की हिचकी,

तुम सब पहचानते हो,

तुम सब कुछ तो जानते हो|

मेरे क़दमों की आहट,

मेरे ख़यालों की बनावट,

मेरे हौसलों की चाहत,

मेरे डर की घबराहट,

तुम सब पहचानते हो,

तुम सब कुछ तो जानते हो|

एक और दिन


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