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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043


सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रथम संस्करण - जून 2018

ISBN

कॉपीराइट © 2018

वर्जिन साहित्यपीठ


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फूलों की खेती

(काव्य संग्रह)







चंद्र मोहन किस्कू









चंद्रमोहन किस्कू 

9732939088
Email-chandramohankisku1997@gmail.com

पिताबोरेन्द्र नाथ किस्कू 
माताबिमला किस्कू

पता: ग्राम - बेहड़ा, डाकघर - हल्दाजुड़ी, वाया-घाटशिला
जिला- पूर्वी सिंहभूम, झारखण्ड














सदस्य:

  • प्रगतिशील लेखक संघ

  • अखिल भारतीय संताली लेखक संघ



अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष

  • Juwan Onoliya नामक संताली साहित्यिक संघ


पुस्तकें प्रकाशित 

  • मुलुज लांदा (संताली कविता संग्रह, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली  से प्रकाशित)

  • फेसबुक (संताली कहानी संग्रह)





































माओवादी नहीं हूँ



मैं खेत में
खलिहान में
काम करता हूँ
ईंट भट्टा में
क्रेशर मशीनों में
काम कर पेट भरता हूँ
तुम्हारी भाषा मुझे आती नहीं
देह का रंग मेरा अलग है
इसलिए तुमने माओवादी करार दिया
आतंकवादी,चोर वैगरह
कहकर प्रताड़ित किया
मैं जंगलों-पहाड़ों में
फूटा छज्जा, पुआल के झोपडी में
रहता हूँ
मैं माओवादी नहीं हूँ
आतंकवादी का अर्थ
मुझे मालूम नहीं
और चोरी तो
खून में ही नहीं है

तुम्हारे नजर में मैं यदि माओवादी हूँ
तो ‘राम ‘कैसे भगवान हुआ?
वह भी तो जंगल में ही घर बनाया था
फल और कंद-मूल खाकर ही तो जिन्दा था





नारी की पुकार



नारी का रूप लेकर
क्या मैं पाप किया हूँ ?
इसमें मेरा क्या है जुर्म ?
भगवान ने ही तो मुझे बनाया है
नर -नारी दोनों मनुष्य
पर मेरी ही चुन कर
शोषण और अत्याचार क्यों ?
क्या मैं गंदगी हूँ ?
मनुष्य के नाम पर खरपतवार हूँ ?
मैं भी माँ हूँ
जिसने तुम्हे जन्म दिया है
पर,क्यों मुझे भारी बोझा समझा गया ?
डायन और दुश्चरित्र कहकर
मांझी अखड़ा में पंचायत कर
लोगों के सामने अपमान कर
घर से निकाल बहार किया।
इतिहास साक्षी है
नारी भी कर सकती है
देश और समाज की नाम रौशन
नारी जन्म लेकर
क्या मैं पाप किया हूँ ?









बुद्ध की हँसी



आज ही खबर मिला
पुरे दुनिया के लोगों को मालूम हुआ
कल राजस्थान के
पोखरण में
अहिंसा के पुजारी
गौतम बौद्ध के जन्मदिन पर
वैज्ञानिकों ने परमाणु शक्तिवाली
मानव को नाश करनेवाली
परमाणु बोमा का परीक्षण किया।
भारत का नाम
शक्तिशाली देशों साथ
बड़े -बड़े अक्षरों में लिखा गया
देशवासियों की छाती
गर्व से चौड़ी हो गई
अपने भाग्य को सराहा
इस देश में जन्म लेने हेतु
राष्ट्रपति खिली फूलवाली मुश्कान के साथ
काशीदें पढ़े उन वैज्ञानिकों के लिए
जिन्होंने इस काम को
पूरा किया
राष्ट्रपति भवन में उन्हें
भोज खाने के लिए आमंत्रित किया

और इधर जादूगोड़ा की
सीताडांगा गांव में
बिरा की बड़ी भाभी
कल ही फिर से
बिन सरवाली बच्चे को जन्म दिया
सिदाम की प्यारी बहन
पांचवी कक्षा तक पहुंचते न पहुँचते
दोनों पैरों से अपंग हो गई
बासो बुआ तो काम उम्र
बूढ़ी हो गई
सुमि ,दानगी ,मायनो जैसी
बहुत साडी लड़की
कुंआरी में ही बृद्धा हो रही है
कितनों को ससुराल से
निकाल बाहर किया है
बच्चे न जन सकने के कारण
यूरेनियम की बुरे विकिरण से
उस काले नाग की डँसने से
मनुष्यों की ख़ुशी
किसी दूर देश को चला गया है।

आज ही रिश्ता आनेवाला था
दूगी माई लिए
दूर पहाड़ी गांव से
बहुत दिनों के बाद
गाँव में ख़ुशी मनाने का
अवसर मिला था
आज ही रायवार आया
खबर पहुचाने
की इस गाँव से वे
वैवाहिक रिश्ता नहीं जोड़ेगें।







फूल



फूल
सुन्दर फूल
केवल घिरे चारदिवारी
के अंदर में ही
खिलता है
ऎेसी बात नहीं
लोगों के दिल में भी
खिल सकता है
और फूल खिलने पर
सुगंध से महकता है
चारों ओर.
केवल खिलने के लिए
चाहिए
पवित्र मन की
उर्वरा काली मिट्टी,
प्यार की वर्षा
और स्वतंत्रता की
उन्मुक्त हवा











नगर



नगर में उगते नहीं है
चौड़ी रिश्तेवाली हरी खेत
नगर में उगते है
तंग रिश्तेवाली
गमले की फूल
नगर में होता नहीं
सोहराय ,साकरात और बाहा पर्व
नगर में होते है पर्व
बड़े -बड़े होर्डिंग में
दिवार पर चिपकी शॉपिंग मॉल की
डिस्काउंट देनेवाली विज्ञापन पर
नगर में लोग
पूछते नहीं हल -चाल
वे केवल अपनी जरुरत ही
प्रकट करते है
नगर में बारिस होती है
पर आता नहीं सावन
बच्चे भींगते नहीं है
खुसी से
नगर में आम की डाली से
गाती नहीं है कोयल
नगर में न सुनाई देता है
बाँसुरी की धुन
न औरतों की गीत की बोल
नगर में होते नहीं है
मांझी की अखड़ा में
नगाड़ा और मंदार की थाप पर
युवक -युवतियों की नाच
नगर में केवल रेडियो और
टेलीविजन पर ही गाते है लोग
नगर को चौड़ी सड़कें और
तंग गलियों में
टहलते समय
फँस सकते हो
वहाँ की तंग दिल की
काली कीचड़ में।

























मैं जिन्दा रहूँगी



मैं जिन्दा रहुँगी
तुम्हारे आँखों के दोनो कोनों में
दया -दर्द की आँसू बनकर.

मैं जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी बन्द मुट्ठी मे
अत्याचार के खिलाफ लड़ाई मे
सहयोग देकर.

मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी सिराओं में
दुश्मनों को रोकने के लिए
गर्म खून दौड़ाने के लिए

मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी कदमों
एक -एक कदम
कठिन और सत्य की डगर पर
ले जाने के लिए

मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी दिल में
आजादी की अभिलाषा में
विहंगे के जैसी पंख
लगाने के लिए
पवन प्राण, नश्वर देह को
त्याग कर
मै जिन्दा रहुँगी
तुम्हारी दया और दर्द में
अत्याचार के खिलाफ
जोर आवाज में
सत्य की पथ पर अग्रसर
तुम्हारी कदमों में
और वसंती हवा
आजाद पसन्द
पवित्र मन में.

(बहन दामिनी की स्मृति में यह कविता लिखी गई है और उन्हीं को समर्पित है)























समाज किधर जा रहा है?



कभी देश के लिए
काम किए हो कि नहीं
देशवासियों की भलाई
सोचे हो की नहीं
पर जोर से _
भारत माता की जय
गला फाड़ कर
जय श्री राम स्लोगान
बोलने पर
तुम देशभक्त गिने जाअोगे

देश की सम्पति को
नष्ट करने पर भी
अपने देश के खिलाफ
षड़यन्त्र रचने पर भी
भारत माता की जय
जोर से बोलो
तुम्हारी सभी तरह की पापें
एक पल में मिट जायेगी

पर अपने अधिकार की बातें
बोलने पर
तुम माऊवादी गिने जाअोगे
धर्म की कुरीतियों
का विरोध करोगे तो…
समाज में हो रहे
अत्याचार के विरोध में
आवाज उठाअोगे तो….
मनुवाद के खिलाफ
बात कहोगे तो…..
तुम्हें देशद्रोही कहे जायेगें
उग्रवादी कहकर
बंदूक के सामने किया जायेगा.

हाय भगवान
देश किधर जा रही है
समाज किस मुहाने पर
पहुंच गयी है























हमारा खून



वे जमीन लुट रहे है
घर से बेदखल कर रहे है
कह रहे है
इसका नाम ही विकास

वे जंगल और पहाड़ों से
खदेड़ रहे है
वैसे बन्जार देशों में
जहाँ खेती का ठिकान नहीं

जंगल से पेड़ काटने की
आवाज लगातार आ रही है
अरे ओ विनाश के ठेकेदार
होशियार
पेड़-लत्ताओं से
निकल रहा है
हमारा ताजा खून


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