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Excerpt for अजनबी शहर by , available in its entirety at Smashwords



वर्जिन साहित्यपीठ पुस्तक प्रकाशन योजना

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प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043

9868429241 / sonylalit@gmail.com


सर्वाधिकार सुरक्षित, प्रथम संस्करण - जून 2018
ISBN
कॉपीराइट © 2018 वर्जिन साहित्यपीठ


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अजनबी शहर

(ग़ज़ल संग्रह)







डॉ मीनाक्षी शर्मा











डॉ मीनाक्षी शर्मा

9716006178

निवास: 2/106, सेक्टर 2, राजेंद्र नगर, साहिबाबाद, ग़ाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) 201005

पति: श्री प्रणव शर्मा

जन्मतिथि: 11 जुलाई, 1975

शिक्षा: एम कॉम, एम् ए (इतिहास), एम एड, एम फिल, पीएचडी, N.E.T. (शिक्षा शास्त्र)





रूचि: शिक्षण, लेखन, संगीत, गायन, पेंटिंग्स बनाना व क्राफ्ट वर्क

पुरस्कार: बेस्ट टीचर पुरस्कार



सम्प्रति: शिक्षण कार्य (शाहजहाँपुर)

लेखन विधाएं: कविता, गीत, ग़ज़ल, बाल कविता, बाल कथा व लघुकथा

































मेरी कलम से

ग़ज़ल हिन्दी और उर्दू भाषा की बेहतरीन और बहुचर्चित काव्य विधा है जो मन में इधर-उधर बेख़ौफ़ घूम रहे ख्यालातों और जज़्बातों को लफ़्ज़ों का खूबसूरत चोला पहना कर लिखने वाले के घर से पढ़ने वाले के दर तक पहुँचाती है।

मैं अपनी पहली पुस्तक “अजनबी शहर” ग़ज़ल संग्रह के माध्यम से आपसे मुखातिब हो रही हूँ। इस ग़ज़ल संग्रह में बहुत ही सीधी सपाट कलम का प्रयोग किया गया है। हर ग़ज़ल में अलग-अलग रंग की स्याही प्रयोग की गई है जो कुछ ख़ास दोस्तों, रकीबों, रहबरों व मेहरबानों ने समय-समय पर भेंट की।

किताब--ज़िन्दगी से ख्वाब चुने हैं मैंने,

मुद्दतों बाद भी आँखों में झिलमिलाएंगे।

हर्फ़ बन बिखरे हैं कुछ लोग मेरे नग्मों में,

रहेगा साथ ये ज़हन से मिट न पाएंगे।



इस संग्रह में कुछ ग़ज़लें रात की कालिमा लिए हैं पर पूरे चाँद की चांदनी में ये ताजमहल सी खूबसूरत नज़र आएंगी...

याद रख पाए भला कौन जाने वालों को,

ज़रा सी बात है तुम इसपे पशेमां न बनो।

तो कुछ उजालों सी उजली राह दिखाती हुई नज़र आएँगी...

वक्त की ही चाल सी हमने रवानी ढूंढ ली,

संग है बचपन और उम्र भी सयानी ढूंढ ली।

किसी में अपने ही दिल की कही-सुनी सी कुछ बातें, कुछ खलिश महसूस होगी...

जाने क्या जादू करता था,

मुझको जब वो खत लिखता था।

तो कोई आसपास होती घटनाओं की ओर इशारा करके नश्तर सा चुभोती हुई मिलेगी...





कैसे कैसे वक्त के मंज़र देख रहा हूँ,

आँगन आँगन उठा बवंडर देख रहा हूँ।

अपने ख्वाबों, ख्यालों और जज़्बातों को लफ़्ज़ों की शक्ल में ढाल कर आप तक पहुँचाने का पहला कदम कहाँ तक सार्थक रहा और इन गज़लों की महक कहाँ तक आपके मन आँगन को महका पाई, यह जानने की उत्सुकता और आपकी सार्थक प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।

हार्दिक आभार

डॉ मीनाक्षी शर्मा







































1



जो तुम न खफा होती तो तुम से कह देता।

इस दिल की ज़ुबाँ होती तो तुम से कह देता।



मेरे दिल की चाहत, चाहत से भरी बातें ,

नज़रों से बयां होती तो तुम से कह देता।



दौलत अल्फ़ाज़ों की मेरे पास तो है लेकिन ,

मेरे पास सदा होती तो तुम से कह देता ।



मुझपे न दोष आए रुसवा तुम भी न हो ,

मुझमे वो अदा होती तो तुम से कह देता।



तुमको पाने के लिए सजदे में रहा हूँ मैं ,

मंज़ूर गर दुआ होती तो तुम से कह देता।





अंदाज़ नाज़ शोखी सब पास है तुम्हारे ,

थोड़ी सी वफ़ा होती तो तुम से कह देता।



बेरुखी इस ज़माने की मैं कैसे सह पाउँगा ,

सबकी जो रज़ा होती तो तुम से कह देता।



तुम भी तो समझती हो क्या तुम से कहना है ,

'लहर' साथ ज़रा होती तो तुम से कह देता।।























2



है कशमकश इस दिल की जो वो कोई सुलझाता नहीं।

क्या करूँ क्या न करूँ अब कुछ समझ आता नहीं।



है बेअसर दवा दुआ हैरान हैं सब चारागर ,

है रोग भी कोई नहीं और दर्द भी जाता नहीं।



रग़बत हरेक शय से उठी बेज़ार आलम से हुए ,

देखा उसे जो एक नज़र अब कोई मन भाता नहीं।



मुस्कुरा देते हैं हम सवालों के जवाबों में ,

चुपचाप रहते हैं कुछ कहना रास आता नही।



वो चंद लम्हे क्या कहें बेबस हुए जाते हैं हम ,

जब सामने होते हैं वो और कुछ कहा जाता नहीं।



आलम की तोहमतें 'लहर' रुसवाई के भी खौफ से ,

हम दिल में रख पाते नहीं और दिल से वो जाता नहीं।।



































3



थोड़ी सी ख़ुशी और थोड़े गम का खज़ाना चाहिए।

इतनी लंबी ज़ीस्त को कुछ तो बहाना चाहिए।



काँटों में उस गुलाब की दिलकश अदा को देखिये ,

कहता है मुश्किल ही सही पर मुस्कुराना चाहिए।



औरों को आज़माते हुए ज़िन्दगी गुज़ार दी ,

फुर्सत मिले तो खुद को आज़माना चाहिए।



हमको चाहत है जिनकी क्या करें उनको अगर,

एक फ़क़त हम ही नहीं सारा ज़माना चाहिए।



गर दाद देने को 'लहर' न कदरदान हो तो फिर ,

खुद ही लिख लिख कर खुद ही को सुनाना चाहिए।।







4



बेवफा ज़िन्दगी से आस न रखिये कोई।

खुद पे हो बोझ ऐसी साँस न रखिये कोई।



रखिये होठों पे नग्में हमेशा प्यार के ही ,

छीन ले दोस्त वो अलफ़ाज़ न रखिये कोई।



जो भी करना है वो करना पड़ेगा खुद ही को,

लोग अपने हैं ये एहसास न रखिये कोई।



सुकूँ की खातिर ख़ामोशी ज़रूरी तो नहीं ,

भीतर दबी हुई आवाज़ न रखिये कोई।



वफ़ा का नामोनिशां मिटने लगा दुनिया से ,

तस्वीर--यार दिल के पास न रखिये कोई।



दिल है मासूम नादाँ और 'लहर' नाज़ुक भी।

दिल की गहराइयों में राज़ न रखिये कोई।।



































5



इस अजनबी शहर में पहचान ढूंढता हूँ।


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(Pages 1-13 show above.)