Excerpt for बड़ी उम्र की स्त्रियों का प्रेम by , available in its entirety at Smashwords


बड़ी उम्र की

स्त्रियों का प्रेम








ममता दीक्षित शुक्ला







वर्जिन साहित्यपीठ

प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043

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प्रथम संस्करण - जून 2018


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वर्जिन साहित्यपीठ






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समर्पण


स्वर्गीय श्री सुरेंद्र नाथ दीक्षित

स्वर्गीय श्रीमती प्रभा दीक्षित

स्वर्गीय गुलाब देवी शुक्ला

पति श्री संजीव शुक्ला

रविशा शुक्ला

जय शुक्ला














आभार


ललित मिश्र,

जिन्होंने हमेशा सार्थक लेखन के लिये प्रेरित किया।


अनिता मिश्रा एवं सौरभ शर्मा

जिन्होंने हमेशा लेखन के लिये प्रोत्साहित किया।













































घरेलू स्त्रियाँ


होतीं है उनकी उपस्थिति,
अनिवार्य..........किन्तु,

होता है जैसे ज्योमेट्री बॉक्स
में उपस्थित सैट स्क्वायर।

होता है जैसे वर्णमाला,
में उपस्थित ङ, ञ।

होती है जैसे ट्रैफिक बत्ती के
खंभे में उपस्थित वो पीली बत्ती।

होती है जैसे मसालेदार सब्जी
में उपस्थिति तेजपत्ते की।

होता है जैसे पैतालीस बाद की
स्त्रियों के शरीर में गर्भाशय।

झोंके रहती है स्वयं को
पकाने, बुहारने- झाड़ने,
समेटने-सहेजने सजाने,
धोने-तह करने में, कि,
दे पाए उन्हें जवाब
प्रत्यक्ष, परोक्ष जो पूछ बैठते है,
"करती क्या हो पूरे दिन"?
तीर सा चुभता ये सवाल।

इसपर भी जो पूछ दे
कोई, परिचय तो,
खिसियानी सी हँसी, हँस
हाउस वाइफ, होम मेकर,
होंमइकनॉमिस्ट, होमइंजीनियर,
नित नए नामों के ओट में,
मिटाती हैं अपनी झेंप।

तलाशती हैं अपने ही घर में,
खुद का अपना एक कोना
क्योकि ये कहाँ कमाती हैं?

सुनो, तुम तो वर्किंग कहलाती हो,
अपने घर की नींव का एक स्तंभ।

तो, दे पाती हो न,
अपनी आय का,
कुछ हिस्सा अपने
वृद्ध माँ-पिता को ??













बड़ी उम्र की स्त्रियों का प्रेम


हाँ, बड़ी उम्र की स्त्रियों को,
भी हो जाता है अकसर प्रेम।
जो होता है एकदम परिपक्व।
जानते हुए कि छली,
जाएंगी, ठगी जाएंगी,
सहर्ष मोल लेती है।

सच तो ये है जीना चाहती है,
अपनी बिसराई, भूली जिंदगी,
जो दफना आई दायित्व की,
चट्टान के नीचे, गहरे कहीं।

सिर्फ देना ही नहीं वो,
पाना भी चाहती है वो स्नेह।

उनकी उम्र से बड़ी होती है,
उनकी परछाईं की उम्र,
जो मुड़ झिड़कती है,
"हद में रहो, हो जाएगा
चरित्र दागदार।"

नहीं व्यक्त करतीं है वो अपनें,
अंदर उमड़ती भावनाएं।

छेड़ना चाहती हैं,
चिढ़ाना चाहती हैं
खिलखिलाना और शरमाना
चाहती हैं खुल के।

नहीं लुभाता उन्हें,
दैहिक आकर्षण
नहीं बनना चाहती,
वो बिछौना किसी का।

होती है बस चाह, मन से
मन के मिल जाने की।

खोजती है वो ऐसा कोई,
जो दे तवज्जो उन्हें,
मुखर हो, बिखर जाए,
जिसके समक्ष बिना किसी,
लाज शर्म लिहाज पर्दे के।

बांटना चाहती हैं
बचपन, जवानी और
चल रही कहानी ।

रोक लेती है उन्हें,
रिश्तों की मर्यादा,
पकड़ हाथ खींच ले जातीं है
वापस, लक्ष्मण रेखा,
ओहदों की।

खींच लेतीं है खुद के इर्द गिर्द
लक्ष्मण रेखा खुद ही।

छुपा लेती है खुद को,
कहानी, किस्सों,
लेखों, संस्मरणों के
भीतर ही कहीं।

हाँ, बड़ी उम्र की स्त्रियों
को भी हो जाता है
अक्सर प्रेम।



























सुख की परिभाषा


सुख क्या है?
कब मिलती है खुशी तुम्हें,
जानना चाहती हूं तुमसे,

हाँ, होती है परिभाषा,

अलग अलग सुख, और खुशी की।

कुछ विचित्र और विक्षिप्त
आदतें है सुख पाने की।

बचपन मे अक्सर गिरने से,
चोट लग जाया करती थी,
हमेशा से घुटने चोटिल घायल
ही रहते है, उनसे रिसता लहू
उठता दर्द, बड़ा आनंद देता था।

जब कभी वो घाव सूख जाता और
काली खोपट जम जाती,
तो दर्द बंद हो जाता, बस यही
तो पसंद नही था वो
टीस जो नही उठती थी,
नाखून से कुरेद कुरेद फिर,
हरा कर देती उस घाव को,
रिसने लगता फिर से खून,
दर्द तब जा के चैन आता।

बत्ती चली जाती जो कभी तो
खुश हो जाती, झट मोमबत्ती ले
आती, उजाले के लिये नही,
पिघल गिरती मोम की बूंदें
अपनी हथेली के पीछेे
टपकाने के लिये,
वो जलन बड़ा सुकून जो देती थी।
मोती सी चमकती बूंदों से अलग अलग,
आकृति बनाने में बड़ा मजा आता था।

आज भी कहाँ बदला है कुछ,
बस तरीके और ढंग बदला है।

ढूंढ ही लाती हूँ कही न कही से,
किसी का चीखता कराहता घाव,
चुभाती हूँ खुद को विषबुझे कांटे,
चढ़ने लगता है जब पूरे शरीर में
नीली पड़ने लगती हूं जब,
डूब जाती हूँ गले तक, और फिर
खीच उसे बाहर निकाल
लाती हूँ अपने साथ।

ऐब और लत साथ साथ ही चलती
है तमाम उम्र, मशान तक।

ऐसा नही कि कोशिश नही की,
बाँधी थी मेड़ ऊँची ऊँची अपने
आस पास कि रोक लूँ
बहने से खुद को,
कँटीली झाड़ियां भी तो लगाई थी
उस मेड़ के चारों ओर।
और बाँध लिया था मोटी मोटी
सांकरो से खुद को कस के।

जरा सा मिट्टी का ढेला जो ढहा,
तो बिछा दिया था खुद के स्वाभिमान,
आत्मसम्मान, आत्मा को सैलाब के विरुद्ध,
जैसे "अवंति" गुरु आज्ञापालन के लिए
बिछा रहा था स्वयं
बांध बन उस बाढ़ में।

भीतर स्थित बुद्धि रूपी
गुरु की आज्ञा मानी तो थी,

कहाँ बस में, कर पाया है
कोई आग को, कौन बांध पाया है,
वायु के वेग प्रचंड को।

हाँ, फिर लाँघ, बन्धन सीमाएं,
तथाकथित समाज की,
खुद को खरोचते, चीरते फाड़ते
उलझते लिपट गई उसी दर्द, टीस से
आदतन खुश हूं फफोले देख ।
दहकता और दमकता है चेहरा।
अपने इस कराह और
रिसते लहू से।
यही सुख है मेरा और तुम्हारा?








अब सौ बटा सौ


अब और नही आधा पौना
तीन चौथियाई, या दो तिहाई।
अब तो बस सौ बटा सौ।

जीती हूँ एकदम पूरा।
हँसती हूँ, जोर जोर से,
ठहाके लगा लगा के,

नही छुपाती अब आँसू,
आ जाते है जोआँखों मे
पढ़ते या देखते फ़िल्म, सीरियल
छोड़ दिया, तकना चोरी से,
कि "ये" या "वो" क्या सोचेगा?
रो लेती हूँ अब खूब खुल के।

नही करती अब मलाल
अपने मोटापे और चौड़ी कमर का
कभी शोर्ट्स, स्कर्ट, वनपीस
तो कभी पहन साड़ी
खूब इठलाती, इतराती हूं।

न झेंपती हूँ अब,
गिरने से दुपट्टा,
या सरकने से पल्ला,
नही परवाह है अब
किसी की भी घूरती
निग़ाहों की,
जो है, सो है,
बढ़ जाती हूँ आगे।

क्योकि अब और नही
आधा पौना....सौ बटा सौ।

उमड़े गर प्यार तो जता
देती हूँ अब झट से,
नही करती भेद अब
उम्र और लिंग का,
बढ़ आगे गले लगती हूं।
क्योंकि नही आधा पौना
अब...तो..सौ बटा सौ।

पार्टियों में खूब खुल के
नाचती कूदती हूँ,
बेताला आनन फानन।
बेसुरा पर, ज़ोर से गाती हूँ,
नही करती परवाह कि,
हँसेगा कोई
अब खुद पर हँस लेती हूँ,
क्योंकि
अब और ...नही...आधा पौना
अब तो .....बस..... सौ बटा सौ।

हां फूंकी थी उस दिन सिगरेट भी,
चाय की चुस्कियों संग दुकान पर।

पी थी वोडका, संग सहेलियों के,
दोनों, लगी कड़वी, कसैली,
किंतु किया, हाँ, जो मन मे आया।

क्योकि अब....नही......
आधा पौना अब तो......सौ बटा सौ।


क्योंकि
देखती हूँ हर रोज अपनी
सास को,
जूझते, लड़ते पकड़ते,
हर एक साँस के टुकड़े को,
जैसे हर एक साँस के साथ,
जी लेना चाहती हैं एक पूरा जीवन।

ले जाती हूँ जब उन्हें पकड़ हाथ,
कदम दर कदम बाथरूम,
तो जैसे लाँघ जाना चाहती है वो,
हर कदम के साथ एक पूरा जीवन

उनींदी, आस भरी निगाहों से,
देखती है मुझे ऐसे कि कह रही हो
बाकी है देखनी और अभी,
ये रंग बिरंगी दुनियाँ।

जान जाती हूँ, पहचान जाती हूँ,
उनकी जीभ की चटपटी मांग।

नहलाते वक़्त नही दिखती कोई
स्त्री पुरुष उनमे, बस दिखती हैं,
पंचतत्व रचित काया जिसे चाहिए
कुछ और पल, मिनट, घण्टे, दिन
और कुछ साँसे उधार।

तब होती हूँ मैं आधा पौना नही,
सौ बटा सौ सेवारत बहू उनकी।

हाँ, बस इसलिये ही,
नाप लेना चाहती हूँ
बाँध पैरों में लंबी बल्लियाँ
लंबे लंबे डग से सारा संसार।

बस अब और नही, आधा, पौना,
तीन चौथियाई या दो तिहाई,
अब तो सौ बटा सौ ।





















स्वावलंबन


स्वाबलंबन स्त्री के अस्तित्व का,

वो अनिवार्य अगला पहिया है,

जिसके घूमते ही, आत्मसम्मान और

आत्मविश्वास तेजी से घूमने लगते हैं।

























प्रथम स्त्री शतरूपा


सृष्टि के प्रारम्भ में आया था जब
वह प्रथम पुरुष, स्वायंभुव मनु
तब ही तो प्रकट हुई थी "शतरूपा", प्रथम स्त्री,
सिर्फ और सिर्फ, उसके लिये।

उस प्रथम पुरुष के
जीवन को, बनाने पूर्ण।

साथ मिल सृजन की
नव सृष्टि सारी।
किया जीवन विस्तार,
सह प्रसव पीड़ा।

देती रही उसका साथ,
हर जटिल परिस्थिति में,
प्रथम कदम से अब तक।
बन पार्वती, शिव की,
रही गुफाओं और कंदराओं में।

कभी बन सीता, राम की,
भटकी वन वन।

तो कभी बनी मीरा, मोहन की
फिरी नगर नगर बन जोगन ।

भोगा दंड, बिन अपराध
बन अहल्या, गौतम की।

किया प्रेम सह षड़यंत्र
बन आम्रपाली, अजातशत्रु को,

तब भी, न जाने कब क्यों,
कैसे होता रहा भंग मोह उसका ।
कभी त्यागा, किया शापित
हारा जुए में, तो कभी छोड़ा
प्रसव काल मे भटकने को।

वह प्रथम स्त्री तो, आरम्भ से ही
रही समर्पित उसके लिये,
बदलता रहा रुप, रंग, स्वभाव
अपना वो प्रथम पुरुष
तब से अब तक निरंतर,
प्रकृति प्रवृति अनुसार।

बन गया, कब वो
प्रेम प्रतीक कृष्ण से,
"बुद्ध"
छोड़ गया, उस प्रथम स्त्री को,
बना "राधा "से "यशोधरा",
हां, वही सृष्टी का प्रथम पुरुष।
भोगती आई है आरंभ से यही,
भोगेगी अंतिम तक
अंतिम स्री भी।







नीम सी कड़वी


लंबी लंबी होती जा रहीं है उंगलियां
नाखून भी टेढ़े मेढ़े लंबे लंबे से,
धसते जा रहे है पंजो से निकल
जमीन में गहरे कही।

पंजे बदल रहे है
लंबी मजबूत जड़ में।
हाथ टहनियों में,
धड़ चौड़े तने में।

हो गई हूं एक नीम का पेड़
और चढ़ी है उसपे करेले की बेल।
कसैला सा, खूब कड़ुआ सा

नाक औऱ आँखे बेजान सी,
काले घेरों से घिरी।

जुबान इतनी कड़वी की सालो
बुखार रहने के बाद
मुँह कड़वा होता है जैसे।

रूखे बाल, सूखे गाल।

कही कोई मिठास नही
फूल तो जिसके दिखते नही
हाँ फल भी कड़वे।
नही होने देना चाहती निबोरी को,
पीला, पका, मिठास भरा।
बस हरा जो रहे कड़वा सदा।
हो जाऊं जड़ कही कोई चेतना नही।

बस एक तरफ खड़ी,
देखूँ दुनियाँ कीभाग दौड़,
जीवन की तलाश में

भटकते, कुचलते एक दूसरे को
पीछे छोड़ने की होड़।

अच्छा लगने लगा है कोसना
किसी का भी अब,
विचित्र आंनद आता है, कोई चिढ़े,
नफरत करे, अंट शंट कहे।

किसी की, किसी भी बात का,
जवाब न देकर सुनते रहना सिर झुकाये।
उससे सामने वाले को जो संतुष्टि,
मिलती है उसे देखना अच्छा लगता है।

सुस्ता ले थक के कोई राहगीर
तो कोई आपत्ति नही।
बुरा नही चाहती किसी का,
हाँ पर किसी का हाथ पकड़
उठाना भी नही चाहती।

अक्सर सहारा देने से
लगाव हो जाता है,
और मैं नफरत की तलबगार हूँ।

पढ़ा था कही एक बार,
अफ्रीका में एक गाँव है
जहाँ पेड़ को काटते नही है,
जब काटना होता है,
तो पूरा गाँव इक्कठा हो,
उस पेड़ को कोसने लगता है
कुछ दिनों में वह खुदबखुद
सूख जाता है।

ऐसा ही एक अंत चाहती हूँ
मैं भी, काटना नही मुझे,
बस इतना कोसना की सूख जाऊँ,
इसलिये नहीं कि कटने से डर लगता है
बल्कि इसलिये कि
कोसने से, लोंगो का मैल बाहर
आ जाता है,
और उनका अन्तः करण हो जाता है
शुद्ध पवित्र नवजात शिशु की तरह।

हाँ बन जाना चाहती हूँ
कसैला सा कड़वा सा
वही नीम का पेड़।













हद में हूँ


न आंक मुझे शरीर से,
इस देह और तेरी सोच से
बहुत ऊँची हूँ मैं।


देखना कभी ख़ुद से
बाहर........... आके,
चोंधिया जायेगा तू।
मत दिखा मुझे मेरी हद,
हद में हूं, तभी तो तू है।


न कर उपहास मेरा,
किया था उस सरफिरे ने भी,
आजतक नहीं उबरा विश्व
उस कुरुछेत्र के विनाश से।


हां, हद में हूँ, तभी,
तुम्हे बॉट पाती हूँ,
परस्त्री से, राजी राजी
तभी तो सुनते हो,
एक राजा थे दशरथ,
उनकी तीन रानियां थी।


सुन सकते हो?
एक रानी थी,
उनके तीन राजा थे।


हाँ हद में हूँ, तभी तो ऊब,
जाते हो कुछ सालों में,
कह डालते हो तलाक तलाक,
तीन बार, मुक्त हो जाते हो,
जिम्मेदारियों से तमाम अपनी।


रह जाती हूँ अपमानित
अवहेलित, बच्चो के साथ।


गर, जता दी होती ऊबन अपनी,
कह दिया होते मैंने वो तीन शब्द,
पाल पाते ? हो तिरस्कृत,
बच्चो को साथ?
हाँ, हद में ही हूँ तभी,
आज भी घर के काम
निपटाती हूँ, जरुरत पड़ने पर
तुम, जितना ही कमाती हूँ।


लेकिन फिर जब घर आती हू,
तो हँस के बच्चों को गले लगाती हूँ,
थकान कभी नहीं, जताती हूँ,
मनपसंद खाना बनाती हूँ,
फिर बच्चो को पढ़ाती,
साथ उनके समय बिताती हूँ,
थके होने के बाद भी,
सामने तुम्हारे खुद,
बिछ जाती हूँ।


हां अब न बताना हद मेरी,
बस थोड़ा आत्मसम्मान चाहती हूँ।
तुम अपनी हद न भूलना
ये चेताना चाहती हूँ।


बंधन


हाथ छोड़ना स्त्री के लिये
उतना ही कठिन होता है,
जितना कि किसी पुरुष के
लिये हाथ का थामे रहना।

























हसरतें


तू आये और लिपट जाऊ सीने से,
अब वो हसरत नही होती,

देखते ही तुझे धड़कन बढ़ जाए,
अब ऐसी हालत नही होती,

किसी और से करे बाते तू
और मैं सुलग जाऊ अब
ऐसी मेरी तबियत नही होती,

इंतजार करु तेरा और तू न आये
गुस्से से बौखलाऊँ
ऐसी फितरत नही होती,

धधकती थी जो आग सीने में
न जाने कब राख हो गई,
अब ऐसी कोई हरकत नही होती

जाने से तेरे भर जाती थी जो
सूख गई कही वो नदी
अब कोर भी गीली नही होती।

बरस जाए आसमाँ कि
सुलग जाए नदी कोई
किसी भी बात की अब
हैरत नही होती ।

कब तक करती और इंतजार तेरा
तू बना मुझको अपना अब तो
ये चाहत भी नही होती।

लाख सजाले तू अब महफिलें
करू कैसे शिरकत
हमसे अब ये मोह्हबत नही होती।


























एक था “वो”, एक थी “मैं”


बड़ा फर्क था उसमें और मुझमे,
वो पुरुष था, पौरुष से परिपूर्ण,
गंभीर शांत, स्थिर, सौम्य, भरा सा,

और मैं औरत पत्नी, बहू, माँ
रिश्तों के फंदे में गूँथी, अस्थिर,
गहरी, अशांत, विचलित चित्त,
पल में रोना, दूसरे पल हँस देना।
जिम्मेदारियों और कर्तव्यपरायणता से

रोज हर पल थोड़ा थोड़ा खाली होती
खर्च होती,
रोज थोड़ा थोड़ा बिखरती,
कभी थोड़ा समेटती खुद को।

हर नए दिन के साथ मन का कोई
कोना चटकता,
दरार की महीन रेखा दिखती।
खुद के उठा पटक में,
महीन रेखा तब्दील हो जाती,

पहले चौड़ाई बढ़ती,
फिर गहराई बढ़ती,
फिर एक दिन अचानक से"खट्ट"

की आवाज सुनाई देती और

गिर के टूट जाता कि महीन टुकड़ो में
मन का वो कोना।


ये प्रक्रिया अचानक
एक दिन में नही होती,
सालो लग गए जैसे,
मैदान के पठार बनने की प्रक्रिया।
रोज थोड़ी थोड़ी मिट्टी जमा होती है

और सालो बाद वो बन जाता है

सामान्य से कुछ अलग सा।

वो टुकड़े इतने विचित्र,

अलग अलग

आकार के होते कि,
रात के अंधेरे मे, चुपचाप

, दबे पांव से उठ कर, जोड़ना भी चाहो,
तो जुड़ नही पाते, कही न कही

कोई खाली जगह रह ही जाती।

जैसे बच्चे का वो अलग अलग

तस्वीर के अधूरे टुकड़े जोड़ कर
बनाने वाला गत्ते का खेल,

जिसका एक हिस्सा भी कम हो जाए,

तो लाख कोशिश के बाद भी आधी अधूरी तस्वीर।

थक हार कर वही फेक बिस्तर पे
आ गिरती, झूट मूट सोने की कोशिश में,

खुद से खुद को छलती।
कभी झिंगुर की एकतार
टीस भरी आवाज,
तो कभी मेंढ़क के लगातार

टर्राने की आवाज को कोसते हुए

कान पे तकिया रखती।
इधर करवट तो कभी उधर।

और जब झिंगुर और मेंढक साँस लेने के लिये रुकते,

तो भी वो शांत वातावरण ऐसा लगता कि

जैसे रुक गई हो अचानक हवा
चलते चलते, ठहर गई हो नदी अचानक

बहते बहते।जैसे किसी ने आ के

जीवन को कह दिया स्टैचू।

कान से तकिया हटा देखती गहराती रात,

चिरनिंद्रा में लीन पूरा घर परिवार,
एकबार फिर से शुरू हो जाती,

मेंढक और झिंगुर की जुगलबंदी।

अब इस बार चैन आता चलो फिर
कह दिया किसी ने"स्टैच्यू'से "गो",
फिर थोड़ी देर खुद ब खुद नींद आ जाती।

सूरज फिर एक नया दिन लाता
सीना ताने मुस्कुराहट के साथ,
ठीक"उसकी" तरह।

ऐसा नही की वो खर्च
नही होता था,
किँतु वो खाली नही होता था
जितना खर्च होता रोज
उतना फिर से भर जाता
और न जाने कितनो की दरारे

पाटता जैसे "एम सील" भर
नया जीवन देता है।

वो भी था मेरा "एम सील"
मेरे भीतर की तमाम दरारे,
और खाली पन को बड़े कुशल

कारीगर की तरह पाट देता।
कभी कड़वी दवा की तरह,
तो कभी होम्योपैथिक
की मीठी गोलियों सा।
पकड़ कंधे उठता नई दिशा
और दशा से अवगत कराता।

खुद के भीतर के ज्वारभाटे

को को सीने में दबा मुस्कुराता।

हाँ ठीक ऐसा था
एक उस सा "वो"
एक मैं सी " मैं"



















प्रेम


ये सिर्फ और सिर्फ
कमजोर बनाता है,
पहले जान लेता है,
फिर जान ही ले लेता है।

























भय की कविता


होता गर प्रेम गीत तो लिख देती,
होती कोई विरह कविता
तो पढ़ देती,

कैसे लिख देती वो चीखे,
कैसे उकेरती वो" डर"पन्नो पर,

नही सीखी थी उसने वो वर्णमाला
जिससे लिखि जाती
घबराहट, कांपनाऔर सहमना।

न जाने कब कैसे इतनी बदल गई
वो जो इतना बोलती थी कि
कहना पड़ता घा उसे की रुक कर
साँस ले लो।

इतनी बाते इतनी कहानियां
अनगिनत किस्से बस
सुनाती ही जाती।

सामने से गुजर भर जाए कोई
झट उसके हाव भाव बोली-चाली
की हूबहू नकल उतार दिया करती।

शैतानियों से भरपूर,
नाचने गाने का बेहद
शौक था उसे।
घर में सबसे छोटी,
घर भर की लाडली वो।

थोड़ी हँसी छीनी माँ की बीमारी ने,
शैतानी खो गई माँ के मौत के बाद।

भीड़ में अलग थलग
गुम सी होने लगी वो।

ब्याही कर आई एक
परिचित परिवार में।

आई थी एक नई पहचान के साथ
ढूंढ रही थी अपना खोया परिवार उनमे कही।

सास को अपनी माँ समान माना
ससुर को पिता तुल्य
तुल्य और पिता होने में
बहुत फर्क होता है
अब जान पाए थी वो।

होती जो औरतो की
औरतो वाली बात,
तो सह लेती सारे हालात,

कैसे सह लेती वो,
भीतर तक भेद देने
वाली चितवन।

अनचाही वो घिनोनी नजर,
कांप जाती थी भीतर तक,
उठते बैठते, खाते पीते,
सोते जागते नहाते हर
वक़्त किसी की नजर
में कैद हो रही हो हर वक्त।

ठीक उस चिड़िया के समान
जैसे कुतर दिए हो पर किसी ने,
फड़फड़ा रही हो कही सुरक्षित
स्वछंद नीड़ को।

किससे कहती, क्या कहती,
कैसे कहती, उलझती जा रही थी।
क्या बताती, रक्षक के भक्षक
बन जाने की बात।

नई नई आई थी ब्याह के,
न कर पाई तय कि
कैसे होगी प्रतिक्रिया पति की,
सुन अपने पिता की ये
बदसलूकी की बात।

पर न हारी थी वो
बन गई थी चंडी एक बार।
खोने न दिया आत्म सम्मान।

विद्रोह और विरोध से,
काट दिए रिश्तो के
सारे झूटे जंजाल।

समझ गई थी एक बात
लिहाज, शर्म और लोकलाज
ये सब है सिर्फ भय पैदा करने वाले
है जज्बात।

उसी दिन उघाड़ फेकी
डर की चादर
बदल दिए सारे तेवर।

हो समय महाभारत का,
या हो आज की बात।
कहाँ होती है हिम्मत
बाहर वालो की, कि
पहुचाये कोई आघात,
बचना है उससे जो लगाए बैठा
है घर के भीतर ही घात।

जान गई थी अच्छे से वो,
अब कोई कृष्ण न आएगा,
खुद ही खुद को बचानी होगी
द्रोपदी को अपनी लाज।














उस वक़्त के तुम


अक्सर पूछ बैठते हो तुम
कि मूंद लेती हो आंखे क्यों,
कैसे कह दूँ नही लगते तुम,
उस वक़्त के "तुम", तुम से,

होते हो कोई "और "तब तुम,
दरअसल उस वक़्त का कोई
नही होता ठीक "वैसा"
जैसा कि "वो "होता है।

वास्विकता से परे, अजनबी से,
भावों से परे, अभावों से भरे,
हाव भाव बहके से,
हवन कुण्ड से दहके से,
ज्वालामुखी से प्रचंड।
लपटों से धधकते।
"कपूर" से जल उठते,
जेठ मास से तपते।

और होती हूँ तब "मैं"
होम सामग्री सी मूक,
समर्पित सी, सुगंधित सी,
उस अग्नि में समाहित
मद्धिम सुलगती अगरबत्ती सी,
हल्की रुई की बाती सी,
पूस मास की ठंडी लंबी रात सी,
झील सी शांत ठहरी सी,

तो कहो कैसे खोलूँ नयन अपने,
कहाँ है सामर्थ इतना कि,
खोलूँ दृष्टि होते हुए सृष्टि।

क्या तुम देख पाओगे,
रूढ़ि, परंपराओं, और
आदर्श मुक्त मुझे,
सह पाओगे, जंगली
विभत्स, आसुरी रूप
जो इन रिश्तो के,
मुखोटे के पीछे है ?
स्वीकारोगे क्या जस की तस ?
बस हो भयभीत इसलिये ही
तो ओढ़ रखा है ये आवरण।

तभी तो हूँ धरा सी तमाम
मर्यादाओं, टुकड़ों में बँटी,
तुम आकाश से स्वतंत्र
इंद्रधनुष से रंगों में पगे।

हाँ जब होते हो तुम से तुम,
शांत गंभीर, काम मे लीन,
नहीं होती दृष्टि मुझपर तब,
होते हो वास्तविके" तुम" से तुम
जिम्मेदारियों तले दबे तल्लीन।
कुर्सी पर, पैर पर पैर चढ़ाए बैठे,
समाचार पत्र पर आँखे गड़ाए
वही रोज से चिपरिचित तुम।

हाँ तब मैं भी होती हूं ठीक"मैं"
मुँह तकती, बात जुबान
तक आ के बार बार अटकती।
देख देख ही तुम्हे, संतोष करती,
हर बात पर तुम्हारी,
सहमती की मुहर लगाती।

दरारों में जम आए पीपल सी,
तुम्हारे विस्तृत क्षेत्र के इर्द गिर्द
अपनी सीमा निश्चचित करती।

हां तब होती वास्तविक मैं सी मैं।






















जिद


"जिद", पूरी होते ही
ललक और लगाव खत्म हो जाता है,

पूरी न होने दें।
"प्रेम" भी एक जिद ही तो है।

























इंतजार


तुझसे हो के गुजरती हूँ सौ सौ बार,
तुझसे हुई एक मुलाकात के बाद।
महकती हूँ मुद्दतो तक
तेरे जाने के बाद,
कहे गए तेरे एक एक शब्द
मेंखंगालती हूँ खुद को
न जाने कितनी बार।


हरेक वर्ण के बना लेती हूं अर्थ हजार,
जीने की वजह दे जाती है तेरी एक मुलाकात।
आ बैठती हूँ रोज हर शाम,
उसी बरगद तले,
करवाती हूँ खुद को
तेरे करीब होने का एहसास।


रखती हूं खुद ही खुद के कंधे पे हाथ,
फिराती हूँ उंगलिया खुद के बालों में,
हटाती हूँ खुद ही माथे पे झूलती
वो लट हाथो से अपने बार बार।


बटोरती ही जली सिगरेट की ठूंठ,
सूँघती हूँ, उसे बार बार,
नजर बचा के सबकी लगाती हूँ
होठो पे उसे, बार बार
सोच जल उठती हूँ,
कि ऐसा क्या है इसमें
जो लगाते हो अपने होठों पे इसे हर बार,
तुम्हारे हर कश के साथ जैसे जैसे
सुलगती थी ये बैरन,
धधक उठती थी,
उस चिंगारी से मेरी प्यास।

उतार दी कानों की वो बाली और झुमके,
जब भी मगन हो, बताने लगती थी।


ढेर सारी, अंतहीन ख्वाइशें,
कि कैसे वेनिश में नाव में घूमेंगे,
सारा सारा दिन, और तमाम,
मेरी ऊटपटांग बकबक ।


अब याद आता है, कि तुम
नही सुनते थे शायद बस तकते रहते थे
भाव भंगिमा, और अचानक
यू तर्जनी और अंगूठे घेरे बना
मार देते थे झुमके पे,
जैसे खेल रहे हो कैरम।


टूट जाता था बातो का सिलसिला मेरा,
चिल्ला उठती में आह:,
और खिलखिला उठते थे तुम,
न जाने कितने मुक्के बरसाती थी तब।


अब लगता है जैसे तुम थे श्रोता,
इतनी दूर से सुनने आते थे मेरी
मेरी वो बिना सिरपैर की, बकबक।


मेरी तमाम बातों को
तुम सिर्फ हम्म में ही निपटा देते ।
मुरीद थी मैं तुम्हारी आवाज की,
हर बार तुमसे एक ही गीत सुनती
"मेरे महबूब कयामत होगी"



सुनो बहुत याद आते हो तुम,
सच अब सिर्फ सुनूँगी तुम्हे
और मैं कहूंगी मैं सिर्फ" हम्म"

घुमाते रहना हाथों में पहनी
मेरी चूड़ी गोल गोल।
नही हटाऊंगी हाथ तुम्हारा।

इंतजार में तुम्हारी आज भी
आ बैठी हूँ उसी बरगद के नीचे।
जहाँ बाँधा था वो लाल धागा
मन्नतों वाला।
रेसा रेसा, फंदा फंदा उधड़ रही हूँ,
तेरे इंतजार में,
एक तेरे जाने के बाद।













सत्य की खोज


सोचा न था, एक सुबह यूं भी आएगी,
हर सवेरा, देता था जीवन के आगे बढ़ने का संदेश..
हर भोर कर जाती थी मुझे भाव विभोर,
हर रात बुनती थी हजारो स्वप्न
उन स्वप्नो को, यथार्थ में परिवर्तन होते देखने की
लालसा में, कभी न ले पाई गहन निंद्रा,
जानते हो क्यों? नहीं ना?
भयभीत रहती थी, कही उस गहन निंद्रा में,

कोई स्वप्न न फिसल जाए, मस्तिष्क से,
तुमसे क्या बता रही हूँ,
अपने ह्रदय की व्यथा..
कहाँ पहचान पाई थी तुम्हें,
कहॉ जान पाई तुम्हारे मन के कोलाहल को,
काश की देख पाती तुम्हारी उस दुनियॉ को,

जिसमें तुम जी रहे थे...
स्त्री हूँ न, नहीं सिखाया गया कुछ और,
पति परमेश्वर होता है, उसका घर परिवार स्वर्ग सा सुंदर बनाना है, अपने आचरण और कर्तव्य से, बस यही सिखा पाये थे माता_पिता..
उनकी इस सीख को गॉठ बॉध के ही स्वर्ग सा सजाने चली थी अपने इस संसार को,
कहॉ पता था तब मेरे मंदिर का देवता विचलित है,
इस संसार को छोड़ नये
सत्य_संसार की खोज मेे है,
मेरे तो सत्य भी तुम, संसार भी तुम,

स्वप्न भी तुम यथार्थ भी तुम,
स्त्री थी, स्त्रित्व निभाना जानती थी, वही कर पाई..
नहीं देख पाई तुम्हारे मन की परतो के नीचे किस सच के खोज की चाह है, कहॉ था इतना भान मुझ मूढ़ को,
मेरा सत्य तो तुम और सिर्फ तुम थे, और अपना पुत्र राहुल,
जिसे मैं हम दोनो के प्रेम का प्रतीक समझ बैठी थी,
मैं अभागी इसी भ्रम मे जीये चली जा रही थी,
मेरा तो मोक्ष तुम्हारी
तन_मन से सेवा तक ही था..
किस शांती, सत्य, और मोक्ष की खोज ने

तुम्हे इतना स्वार्थी बना दिया कि
तुम्हारे बाद हमारा क्या होगा
ये सुध भी न आई तुम्हे?


देखा था काली रात का अंधेरा,
मेरे लिये तो उस रात के बाद का
सवेरा और काला, गहराता चला गया,
आज भी उस काली_अंधेरी सुबह की दीवारों,

से टकरा के गिर जाया करती हूँ हमेशा...,
रिसता है आज भी रक्त इनसे,
नासूर बन मन बार बार यही
प्रश्न करता है, क्यो गये यूँ चोरी से?

क्यो सोता छोड़ गए, कर गए अकेला

हमेशा_हमेशा के लिए...
बस एक बार तो कह के देखते, जगा जाते, बता जाते
तुम उद्देश्य जाने का,
सच कहती हूँ, ना रोकती ना टोकती तुम्हें,

ना बॉधती तुम्हें
मोह माया के जाल में,
रख छाती पर पत्थर विदा करती,

एक योद्धा की भांति,
देख लेती जी, भर_भर के तुम्हें,
आशीष दिला, राहुल को
गौरव करती, खुद पर..
हाय, पर एेसा न हो सका,
विश्वास न जीत पाई ये अभागन तुम्हारा,

उफ् नहीं देख पाती हूँ ये ऑखे राहुल की, ..

न जाने कितने सवाल करती है ये?
उसकी चितवन सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ढ़ूढ़ती हैं,
मेरे पास उसकी किसी चितवन का,

किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है,
है तो सिर्फ मौन, पथराई आँखे और एक विशाल शून्य,
जिसमे भटकती मैं, , , विचारों के इस चक्रव्यूह का
ओर_छोर ढू़ढ़ती अकेली मै, , ,

खुद में ही कहीं दोष ढ़ूढती हूँ....
क्या जानो तुम किसी त्यजित
नारि की पीर,
सबकी नजर ही बदल गई एक रात में,
सबको हजारों खोट दिखने लगे हैं मुझमें,
कल तक जो नजरें सम्मान देती थीं

अब उपहास घृणा

अब दोष दिखता है मुझमे उन्हें, , ,
मेरा मान, सम्मान, अभिमान
सब तुम्हारे साथ ही चला गया.....
रह गया है तो बस मातृत्व
और कई सारे सवाल,
महानता की परिभाषा ढूंढती,

सत्य और मोक्ष के इंतजार मे भटकती मैं…








प्रेम है ये भी


ये जो सड़क पार करते वक़्त,

"तुम"उसका" हाथ पकड़ लेते हो न,
उसमें भी "वो" ढूंढ लेती है अपने हिस्से का
प्रेम और बाँध लेती है मुट्ठी भर


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