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काव्य संकलन

यह जो कड़ी है









भोला नाथ सिंह









वर्जिन साहित्यपीठ

प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
9868429241 / sonylalit@gmail.com




सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - जुलाई 2018
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कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ






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दो शब्द



मेरे लिए कविता भावों की अभिव्यक्ति है। आज के युग में छंद और अलंकारों का महत्व नहीं रह गया है। गद्य कविता या मुक्तक ने स्थान ले लिया है। ऐसे में तुक मिल जाना केवल ध्वनि सौंदर्य को बढ़ाने का उपक्रम मात्र है।

इस संग्रह में मैंने प्रयास किया है कि विविध विषयों के मोतियों को पिरोकर एक सुंदर माला बनाऊँ। कड़ी-कड़ी जोड़कर जीवन को अपनी दृष्टि से अवलोकित करने का प्रयास किया है। इसमें मैं कहाँ तक सफल रहा हूँ यह तो पाठक और समीक्षक ही तय करेंगे।

कुछ कविताएँ ज्वलंत विषयों पर आधरित हैं। संभव है कुछ दूसरों की मानसिकता या सोच से मेल न खाएँ। मैंने ‘महाजनो येन गतः स पन्थाः ’ का अनुसरण करने की चेष्टा की है। कहीं प्रेम से सराबोर पंक्तियाँ हैं तो कहीं कथित आधुनिकता को परे ढकेल पुरातन संस्कृति एवं ग्राम्य वातावरण की पक्षधर पंक्तियाँ। कुछ कविताएँ प्रकृति की अनुपम छटा को चित्रित करती हैं।

कविता लिखना एवं उसे प्रकाशित कराना एक कष्टसाध्य कर्म है। लिखना तो बहुत पहले से ही प्रारंभ किया परंतु पत्र-पत्रिकाओं से इतर कोई संग्रह प्रकाशित करवाने की ओर ध्यान नहीं दिया। सुधि पाठकों का स्नेह और आशीर्वाद मिला तो स्वयं को धन्य समझूँगा। आलोचनाओं का भी स्वागत है।

भोला नाथ सिंह







यह जो कड़ी है


यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


आसमाँ नीला है

उसके पार चाँद है

तारे हैं

टिमटिमाते हैं

इनकी चमक

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


वसंत आता है

पुष्प, मकरंद लाता है

सुवासीत होते हैं दिक्-दिगंत

नयनाभिराम सौंदर्य पटी छवि

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


बादल गरजते हैं

झर-झर धारा लाते हैं

धरती हरित आँचल

लहराती है

लहराती धानी चूनर

ओढ़ी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


निराशा के क्षणों में

कोई हाथ बढ़ाता है

ढाढस बँधा जाता है

मीठे बोल कह जाता है

परंपरा यह

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


माना बेईमानी चहूँ ओर है

पर ईमानदारी मरी नहीं है

सौ में दो-चार ही सही

इनकी संख्या

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


चिड़िया तिनका संजोती है

यत्न से घोंसला बनाती है

शावकों को पालती है

पोसती है

यह जो रीत है

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


असंख्य नज़रें बेधती हैं

अंतर्मन चाक-चाक होता है

पर कुछ में शीतलता

थोड़ा स्नेह झलकता है

शांति और सुरक्षा का

अहसास होता है

ये नज़रें

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


सौ दुख के रहे दिवस

पर चार तो सुख भरे थे

जो जिया, जो भोगा

अहसास जो मन में जगे

वो यादें

बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


रात देर तक चलती है रेव

अलसाई सी सुबह आती

पर दूर कहीं बजती है घंटी

मंदिर में अहले सुबह

वो घंटी, शंख ध्वनि

बजती रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


भागमभाग होता है

संक्षिप्त रीति का अनुप्रयोग

जीवन सरल से जटिल बन जाता है

सुदूर देहात में किसान

हल-बैल ले कजली गाता

मदमस्त है चलता जाता

उसकी चाल बनी रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


विदेशी वस्त्र, इत्र, उपकरण

शोभा बढ़ाते घरों के

महानगरों में ईंट-पत्थर, सिमेंट के

उग रहे हैं दरख़्त

सावन में आम्रशाख पर झूला

फागुन में मदमस्त पंचम सुर

कजली, फाग, चैती की तान

गूँजती रहनी चाहिए

यह जो कड़ी है

बनी रहनी चाहिए।


















राजपथ का राही


राजपथ की रगड़ से फटते जूते

रगड़ खाया चश्मा पावर का

हाथों में प्रमाण पत्रों का बंडल थामे

बस के धक्के, उड़ते धूल के गुबार से

खाँसता, छींकता वह

जेब से रूमाल निकालते हाथ

स्पर्श करते हैं भूली हुई चिट्ठी को

आज ही हस्तगत हुई परंतु पढ़ न पाया

समयाभाव में, पहुँचना था कहीं

लंबी साँस छोड़ जा बैठा बेंच पर

पत्र को निकाल खोला -

बेटे, जल्दी आना

माँ के लिए सिल्क की साड़ी

मुन्नी के लिए झालर वाली फ्रॉक

मेरे लिए ट्रांजिस्टर जरूर लाना

यहाँ गाँव में बड़ा रौब झाड़ा है

मेरा बेटा...........देखना जब आएगा

मेरा मान, मेरी शान जिंदा रहे

मुन्नी चहकती रहती

तेरी माँ ने चाय पिला पड़ोसियों को

कई बार बखाना है साड़ी को।






पेट की अंतड़ियाँ मरोड़ खा रही थीं

सामने ढ़ाबा था खुशबू उड़ाता

जेब में हाथ डाला, दो का सिक्का पड़ा था

एक मुट्ठी में काले पुते कागज़ों का पुलिंदा

दूसरी में दो का सिक्का

चेहरे पर धूल की परत लिए

वह बढ़ चला रेहड़ी की ओर

सत्तू पानी का एक गिलास गटक

वह पुनः चल पड़ा राजपथ पर।


















विजयोत्सव


पुराकाल घटित घटना यह रोमांचक

नारी हरण कर अभिशप्त वह वंचक

भार बना इस धरा धाम का

रिपु बना पुरूषोत्तम श्री राम का

ज्ञाता वेद का था महाज्ञानी

विवेकहीन हो बना दर्पी, अभिमानी

दानवत्व का प्रचंड हुँकार कर

कँपा रहा था मेदिनी निशी वासर

दर्प ने उद्वेलित किया सिय हरण को

आतुर, उत्कंठित था जानकी के वरण को।

जनकात्मजा को करने बंधन मुक्त

रघुवीर पधारे वानर सेना युक्त।

राज्ञ रावण था चतुर, बलशाली

साथ रथ, अस्त्र-शस्त्र, सैन्य वैभवशाली

दशरथ तनय लघु, रथ, कवच विहीन

सैन्य बल लघु किन्तु संचालन प्रवीण

सेतु बना जलनिधि पर पाषाण का

कठिन लक्ष्य को जान आसान सा

विगुल फूँका रण घमासान का

वक्ष पट गया वाणों से आसमान का।

लक्ष्य कठिन हो रहा था प्रतीत

सैन्य शक्ति बिखरने लगी हो भयभीत

तब रघुनाथ शरण गए शक्ति का

परिचय दिया अपनी दुर्गा भक्ति का

पवनपुत्र ले आए नील पंकज सत्वर

राम समर्पित करने लगे मंत्रोच्चारित कर।

अष्टाशत न हो पाया पूर्ण

देवी ने किया आयोजन चूर्ण

राजीवलोचन ने करने पूर्ण वह प्रक्रम

अपना ही लोचन समर्पण का किया उपक्रम।

शक्ति का वरदान मिला अभिलषित

जय ध्वनि होने लगी उच्चरित

स्ंहार हुआ दशानन महाबली का

अन्यायी, दुराचारी, छली का।

स्मरण में उसी विजयोत्सव का


आयोजन होता है इस उत्सव का

पुतले बनते हैं देव-दानव के

निमित्त केवल मनोरंजन मानव के

विजय न्याय का, नीति का, धर्म का

पराजय दुर्नीति, अन्याय, अधर्म का

मात्र कल्पना, एक छलावा बन ठग रहा

मानव दुराचार, अन्याय में आज पग रहा

विपरीत घटित हो रहे सब घटनाक्रम

रावण अटटाहास कर रहा, टूटा राम का भ्रम।










स्नेह रंग चुटकी भर


इस वासंती वेला में

देखो ! प्रकृति झूम उठी है

हर्ष के अतिरेक तरंग में

पुष्पों ने आमंत्रित किया है

नेह निमंत्रण से अनंग को

अनिल भी मकरंद पाकर

उल्लसित हो उठा है

कोमल झकोरे डाल, कर रही हवा

लता-तरु को आलिंगनबद्ध

सब प्रेममत्त हैं, नेहमय हैं

आओ, इस उत्सव को

थोड़ा और जीवंत बना दो


अनुराग घोल उँडेल

कर दो सराबोर प्रेम में

आलिंगन में छुपा लूँ तुम्हें

पीयूँ प्रेमरस मटकी भर

आओ गालों पर मल दूँ प्रिये

स्नेह रंग चुटकी भर।








आमंत्रण


पर्वत के उन्नत शिखरों पर

मन नाहर को नर्तन करने दो,

गिरि गह्वर से प्रेम निर्झर को

झर-झर, झर-झर बहने दो।


हृदय और मन से कवि हूॅं

पर तन से भी अब बनने दो,

समाज शृंखला में जकड़ा हूँ

अब बेड़ियों को फेंकने दो।


मेले में अकेला रहा

किसी को सहयात्री बनने दो,

संकोच हटा स्वच्छंद कहो

औपचारिकताओं को अब रहने दो।


कोल्हू का बैल, धोबी का गदहा

उपमानों से छूटकारा पाने दो,

प्रेम में पगकर जीवन का

आनंद, अनुभूति आने दो।


तुम भी जकड़े हो परंपरा में

मन कीर को बाहर आने दो,

नील अंबर के विस्तृत पटल पर

स्वच्छंद विचरण करने दो।



बंधन की आकांक्षा से परे

मन से मन को मिलने दो,

नेह निमंत्रण स्वीकार करो

हृदय सुमन को खिलने दो।


जीवन है अनमोल मीत

जनम को सार्थक करने दो ,

जीवन रसों में पगे रहकर

बिन मोल इसे बिक जाने दो।
























बापू! कृतज्ञ तेरा सारा देश


आजादी की लौ जलाई

दे असहयोग का नाम

सत्य, अहिंसा के बल पर तूने

फिरंगियों में मचाया त्राहिमाम।

लाठी, धोती और एक चादर

था अनोखा तेरा वेष

बापू! कृतज्ञ तेरा सारा देश।


निर्बल काया मलिन थी छाया

पर प्रचंड था तेरा आत्मबल

ब्रिटिश हुकूमत डोल गई थी

देख तेरा नेतृत्व कौशल।

कोटि भारतीय अवलंबित तुम पर

ताक रहे थे तुम्हें निर्निमेष

बापू! कृतज्ञ तेरा सारा देश।


सन् बयालिस का अगस्त मास

धूमिल हो रही थी आजादी की आस

करो या मरो’ का देकर नारा

दिया अंग्रेजों को ज़वाब करारा।

भारत की हुँकार से हो भयभीत

छोड़ भारत फिरंगी भागे विदेश

बापू! कृतज्ञ तेरा सारा देश।


आज फिर तेरी ज़रूरत आन पड़ी है

राजनीति भ्रष्टाचार दलदल में खड़ी है

फिर जगा दो चेतना सेवाभाव का

निस्पृह, ईमान के वही तेवर-ताव का।

तेरा आकांक्षित रामराज्य हो स्थापित

मिटे भारतीयों की अकर्मण्यता, अहं, द्वेष

बापू! कृतज्ञ तेरा सारा देश।




























जय भारत बोल


लेखनी मेरी

जय भारत बोल!


जिस धरा पर

अवतरित होते रहे

देव, गंधर्व, यक्ष, मनुज

प्रकृति ने सौंदर्य लुटाया

नगाधिराज विशाल प्रहरी जिसका

सान्निध्य जिसका है अनमोल

लेखनी मेरी

जय भारत बोल!


जहाँ प्रवाहित सरिताएँ अनेक

करती रहती जीवन का अभिषेक

जिनके तट विकसीं सभ्यताएँ

जो है विश्व में सिरमौर

उसका यशगाथाग्रंथ

पृष्ठ-पृष्ठ खोल

लेखनी मेरी

जय भारत बोल!


जहाँ युगों तक नृपति

शौर्य, पराक्रम के उपमान रहे

दानवीरों के प्रासादों में

देवों ने भी चरण गहे

जिनकी उदारता की कथा

इतिहास हैं गाते रहे

जहाँ प्राण न्यौछावर कर

बचाते वीर अपनी कौल

लेखनी मेरी

जय भारत बोल!


स्वतंत्रता जहाँ प्रिय सबको

जहाँ पूजी जाती नारियाँ

पूर्ण संसार ही परिवार सदृश

जहाँ की है परिकल्पना

सत्य, अहिंसा, भ्रातृत्व का

संदेश विश्व को जिसने दिया

जिसे सका न कोई तौल

लेखनी मेरी

जय भारत बोल!



















जिन्दगी


कभी कड़कड़ाती सर्द तो

कभी चिलचिलाती धूप है जिन्दगी

कभी बेहद मुखर तो

कभी बिल्कुल चुप है जिन्दगी।


कभी खुशरंग तो

कभी बिल्कुल बेरंग है जिन्दगी

कभी आसान जीत तो

कभी कठिन ज़ंग है जिन्दगी।


कभी काँटों का ताज़ तो

फूलों की सेज़ है जिन्दगी

कभी बिल्कुल मघ्दिम तो

कभी बहुत तेज़ है जिन्दगी।


कभी फूलों का हार तो

कभी लगती बेकार है जिन्दगी

कभी हौसले पस्त तो

कभी मुकाबले को तैयार है जिन्दगी।


समा जाओ सीप में तो

चमकता मोती है जिन्दगी

बन जाओ दीप तो

जलती ज्योति है जिन्दगी।



मेहनत का दामन थाम लो

एक सरोकार है जिन्दगी

उपलब्धियाँ बटोर लो

बेशकीमती उपहार है जिन्दगी।


सही सुर में बजा लो

एक बेहतरीन साज़ है जिन्दगी

आलस मन में आ गया तो

बड़ी नासाज़ है जिन्दगी।























शिक्षा


आओ तुम्हें सुनाता हूँ

मैं आज एक कहानी

वर्षों पहले मेरी जिद पर

सुनाया करती थी नानी ।


एक बालक कक्षा में

बड़ा उत्पात था मचाता

वहीं एक दूसरा, शांत

सब कुछ गुनता रहता।


पहले की खिंचाई होती

दूसरा पाता शाबाशी

पहला द्वेष ग्रस्त होकर

करता था बदमाशी।


एक दिन बीच बाजार में

पकड़ दूसरे का गिरेबान

पहला बोला - तेरे कारण

मेरा होता है अपमान।


दूसरे ने बड़े शांत स्वर में

उस नादान को समझाया

न मैंने तेरा कुछ छीना


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