Excerpt for चिंगारियाँ by , available in its entirety at Smashwords



साझा काव्य संकलन

चिंगारियाँ

संपादक
संतोष श्रीवास्तव




वर्जिन साहित्यपीठ



प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
9868429241 / sonylalit@gmail.com


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - अगस्त 2018

कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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समकालीन परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप





चिंगारियां’ कविता संग्रह की अधिकतर कविताएँ मौजूदा परिवेश को रेखांकित करती हिंदी कविता के समकालीन परिदृश्य में एक सार्थक हस्तक्षेप करती हैं। फिर चाहे फरीद खान हों, कुशेश्वर महतो हों, डॉ राकेश पाठक हों, राजेंद्र श्रीवास्तव हों, विजय कांत वर्मा हों, शरद कोकास हों, विजय राठौर हों या हीरालाल नागर हों। संवेदना, अभिव्यक्ति और काव्य का ओर-छोर छूती उनकी मौलिक पहचान कराती ये कविताएँ। भरपूर है इन कविताओं का सार्थक स्वरूप।

ये कविताएँ किसी एक विषय में न सिमटकर समग्रता को शब्द और भावभूमि प्रदान करती हैं। इधर पिछले दशकों में कवयित्रियों ने साहित्य में जो मुकाम हासिल किया है इस संग्रह में शुमार कवयित्रियों के बरक्स कहना पड़ेगा मर्हबा.......

रीता दास राम, मधु सक्सेना, पूजा आहूजा कालरा, प्रमिला वर्मा, पूनम भार्गव जाकिर, रुपेंद्र राज तिवारी की कविताएँ काव्य भूमि में स्तरीय दखल रखती हैं। इन कविताओं में उनके  अनुभवों की पारदर्शिता और ताप दोनों समाहित हैं। संयोग-वियोग समाज के प्रत्येक कोने की पड़ताल.....जीवंत स्पर्श सा लगता है। सघनता, अभिप्साएं, शिकायतें, जख्म, कसक और आत्म सजगता के हर सूत्र को थामे कविताएँ कब कितना कुछ कह जाती हैं पता ही नहीं चलता।

वर्जिन साहित्यपीठ के सर्वेसर्वा ललित कुमार मिश्र जी ने जब इस संग्रह के संपादन का प्रस्ताव मेरे सामने रखा तो सब कुछ मेरी पसंद और मूड पर छोड़ दिया। कवियों का चयन, उनकी कविताओं का चयन, संग्रह का शीर्षक, पृष्ठ संख्या - सब कुछ की मेरी जिम्मेवारी। इस संग्रह को संपादित करती मैं अद्भुत एहसास से गुजरी, बल्कि मैंने इस सबको एंजॉय किया।

आभारी हूं ललित कुमार मिश्र जी की इस अवसर के लिए।


संतोष श्रीवास्तव
9769023188













फरीद खान

 kfaridbaba@gmail.com

पटना में पले बढ़े। उर्दू साहित्य में एम ए।
लगभग 12 सालों तक पटना इप्टा में रंगकर्म। 
भारतेंदु नाट्य अकादमीलखनऊ से दो साल का डिप्लोमा। 
अभी मुम्बई फ़िल्म और टेलीविज़न में कथा-पटकथा लेखक के तौर पर पेशेवर लेखन।



अफ़वाह - 1


हर बस्ती में अफ़वाहों के तालाब के लिए

छोटे बड़े गड्ढे होते हैं।


पहले बादलों के फाहे की तरह
ऊपर से गुजरती है अफ़वाह,

थोड़ी बूँदा बाँदी करती हुई।

फिर अफ़वाहों का घना बादल आता है

और पूरी बस्ती सराबोर हो जाती है।

छतों, छप्परों और दीवारों को भिगोते हुए

छोटी से छोटी नालियों से गुज़रते हुए

अफ़वाह इकट्ठी होती है
नदी, तालाब, झीलों में।


कई शहरों में तो पीने के लिए भी

सप्लाई की जाती है

इन झीलों की अफ़वाह।


अफ़वाह - 2


अफ़वाहें कर रही हैं नेतृत्व।


लाल किले पर फहराई जाती हैं अफ़वाह

और मिठाई बांटी जाती है लोगों में।


कल ही संसद में पेश की गई एक अफ़वाह

दो तीन दिन बहस होगी उस पर

फिर पारित हो जाएगा क़ानून बनकर।


पुरातत्ववेत्ताओं ने खुदाई से
निकाल कर दी हैं अफ़वाहें।

संग्रहालय में रखी हैं अफ़वाहों की तोप-तलवारें।

स्कूलों का उसी से बना है पाठ्यक्रम।
उसी से बनी है प्रार्थनाएँ।


कक्षा में भूगोल का शिक्षक
ब्लैक बोर्ड पर लकीरें खींच कर

बनाता है अलग अलग अफ़वाहों के मानचित्र।


चिंतन समिति बड़ी मेहनत
और लगन से तैयार करती है

अफ़वाहों का ड्राफ़्ट।

अफ़वाहों पर विस्तार से होती हैं बातें।

समाज में फैलाई जाती है उनके प्रति जागरुकता।

मुहल्लों में बनाए जाते हैं
इस पार, उस पार।


दुश्मनों को देख नसों में रक्त का प्रवाह तेज़ हो,

सरहदों पर लगाए जाते हैं अफ़वाहों के कंटीले तार।


अफ़वाहों की पलटन


अफ़वाहों की पलटन उतरी।

उसने घेर लिया पूरे मुहल्ले को।

रात का सन्नाटा और
दरवाज़े पर लगाते हुए निशान

अफ़वाहें खटखटा रही थीं
लोकतंत्र का मकान।


नींद बहुत गहरी थी लोगों की।

सुबह जब वे उठे,

वे घिर चुके थे अफ़वाहों से।


अफ़वाहों के प्रवक्ता


एक अच्छे अमानवीय शासन में ही
स्थापित की जा सकती हैं

आफ़वाहों की ऊँची ऊँची प्रतिमाएँ,
जो घृणा के बिना संभव नहीं है।

ख़ून पसीना एक करना होता है,
त्याग करना होता है।

झोला लेकर नगरी नगरी
द्वारे द्वारे घूमना होता है।

घृणा से प्रेम का परिवेश
निर्माण करना होता है।

अफ़वाहों की स्थापना के लिए
एक कर्तव्यपरायण घृणित समाज का
निर्माण करना होता है।


मित्रों के रूप में आते हैं
अफ़वाहों के प्रवक्ता।

शिक्षक के रूप में भी आते हैं।

मुहल्ले के बुज़ुर्ग के रूप में भी आते हैं।

सभी हितैषी समझाते हैं
लाभ और हानि अफ़वाहों के।


टीवी में भी दिखाई जाती हैं अफ़वाहें,

लेकिन ठीक उसके पहले
घृणा का एक स्लॉट होता है।

मास मीडिया के ऊर्जावान नौजवान
बड़ी मशक्कत से घृणा की ख़बरें लाते हैं।


माफ़ी


सबसे पहले मैं माफ़ी मांगता हूँ हज़रत हौव्वा से 

मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि
उसने आदम को बहकाया था 

और उसके मासिक धर्म की पीड़ा
उसके गुनाहों की सज़ा है
जो रहेगी सृष्टि के अंत तक 

मैंने ही बोये थे बलात्कार के
सबसे प्राचीनतम बीज


मैं माफ़ी माँगता हूँ
उन तमाम औरतों से 

जिन्हें मैंने पाप योनी में जन्मा हुआ घोषित करके 

अज्ञान की कोठरी में धकेल दिया 

और धरती पर कब्ज़ा कर लिया 

और राजा बन बैठा
और वज़ीर बन बैठा
और द्वारपाल बन बैठा

मेरी ही शिक्षा थी यह बताने की
कि औरतें रहस्य होती हैं 

ताकि कोई उन्हें समझने की
कभी कोशिश भी न करे

कभी कोशिश करे भी तो डरे,
उनमें उसे चुड़ैल दिखे


मैं माफ़ी मांगता हूँ

उन तमाम राह चलते उठा ली गईं औरतें से

जो उठा कर ठूंस दी गईं हरम में

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन औरतों से
जिन्हें मैंने मजबूर किया सती होने के लिए

मैंने ही गढ़े थे वे पाठ कि
द्रौपदी के कारण ही हुई थी महाभारत

ताकि दुनिया के सारे मर्द
एक होकर घोड़ों से रौंद दें उन्हें 

जैसे रौंदी है मैंने धरती


मैं माफ़ी मांगता हूँ उन आदिवासी औरतों से भी 

जिनकी योनि में हमारे राष्ट्र भक्त सिपाहियों ने घुसेड़ दी थी बन्दूकें

वह मेरा ही आदेश था

मुझे ही जंगल पर कब्ज़ा करना था
औरतों के जंगल पर

उनकी उत्पादकता को मुझे ही करना था नियंत्रित 


मैं माफ़ी मांगता हूँ निर्भया से

मैंने ही बता रखा था कि
देर रात घूमने वाली लड़की बदचलन होती है 

और किसी लड़के के साथ घूमने वाली लड़की तो निहायत ही बदचलन होती है

वह लोहे का सरिया मेरा ही था
मेरी संस्कृति की सरिया 


मैं माफ़ी मांगता हूँ आसिफ़ा से 

जितनी भी आसिफ़ा हैं इस देश में
उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ

जितने भी उन्नाव हैं इस देश में

जितने भी सासाराम हैं इस देश में,

उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ


मैं माफ़ी मांगता हूँ अपने शब्दों
और अपनी उन मुस्कुराहटों के लिए 

जो औरतों का उपहास करते थे

मैं माफ़ी मांगता हूँ
अपनी माँ को जाहिल समझने के लिए

बहन पर बंदिश लगाने के लिए
पत्नी का मज़ाक उड़ाने के लिए


मैं माफ़ी चाहता हूँ
उन लड़कों को दरिंदा बनाने के लिए

मेरी बेटी जिनके लिए मांस का निवाला है


मैंने रची है अन्याय की पराकाष्ठा

मैंने रचा है अल्लाह और ईश्वर का भ्रम

अब औरतों को रचना होगा
इन सबसे मुक्ति का सैलाब


प्रधानमंत्री जी


अगर यह भी तय हो जाए
कि अब से मूर्तियाँ ही तोड़ी जाएँगी दंगों में

तो मैं इस तोड़ फोड़ का समर्थन करूँगा

कम से कम कोई औरत
बच तो जाएगी बलात्कार से

नहीं चीरा जाएगा किसी गर्भवती का पेट


मैं तो कहता हूँ कि मूर्ति तोड़ने वालों को
सरकार द्वारा वज़ीफ़ा भी दिया जाए

कम से कम कोई सिर्फ़
इसलिए मरने से तो बच जाएगा 

कि दंगाईयों के धर्म से
उनका धर्म मेल नहीं खाता


इसे रोज़गार की तरह देखा जाना चाहिए

कम से कम सभी धर्म के लोग
सामान रूप से जुड़ तो पाएंगे
इस राष्ट्रीय उत्सव में

तब किसी दलित पर किसी की नज़र नहीं पड़ेगी 

और ऐसे में कोई दलित
बिना किसी बाधा के मूँछ भी रख पाएगा 

और घोड़ी पर भी चढ़ पाएगा


प्रधानमंत्री जी,
वैसे तो आप जनता की बात सुनते नहीं हैं

पर यकीन मानिए
मैं मुकेश अंबानी बोल रहा हूँ


आओ मिल कर बद्दुआ करें


दुनिया का कोई क़ानून
बद्दुआओं के लिए किसी को रोक नहीं सकता

इसलिए आओ, सब मिलकर बद्दुआ करें कि

इस व्यवस्था के पोषकों को कीड़े पड़ें

आओ उनकी जड़ों में मट्ठा डालें


जिस संसद, अदालत, और प्रशासन को
नहीं दीखते आँसू
उन्हें आंसुओं में बहा दें

हमारी अदालत उन सबको

मुजरिम करार देती है

उन सबका पुतला बनाकर थूक दें उन पर

या घरती पर उनके चित्र बनाकर रौंद डालें

दुनिया का कोई क़ानून कुछ नहीं कर पाएगा


भले हम बोल न पाएँ,
लेकिन सपना तो देख ही सकते हैं

दुनिया में कोई भी
सपना देखने से नहीं रोक पाएगा

इसलिए जो कुछ भी अच्छा है
उसका मिलकर सपना देखें

और सपना नींद में न देखें
इस बात का ख़याल रहे

दुनिया का कोई भी क़ानून
खुली आँखों से सपना देखने से नहीं रोक पाएगा


तो आओ मिलकर बद्दुआ करें उस व्यवस्था के लिए

जिन्हें लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का
कोई दोषी नहीं मिलता

जिन्हें हत्यारे नहीं मिलते रोहित वेमुला के

जिन्हें बलात्कारी नहीं मिलते मणिपुर के

जिन्होंने सोनी सोरी की योनि में
ठूंस दिए थे पत्थर

उनके लिए बद्दुआ करें

हमने उस क़ानून को कभी नहीं तोड़ा
जो हमारे दमन के काम आते हैं

लेकिन आओ ग़ुस्से से देखे उन्हें

दुनिया का कोई क़ानून
ग़ुस्से से देखने पर हमें रोक नहीं सकता


मन ही मन बना डालते हैं एक देश
किसी को पता भी नहीं चलेगा

और मन में कोई देश बनाना
क़ानून का उल्लंघन भी नहीं है

मन ही मन दोषियों को सज़ा देना भी
क़ानून का उल्लंघन नहीं है

और अदालत को पता भी नहीं चलेगा कि
उनके छोड़े हुओं को हमने सज़ा दे डाली है


जिन्हें नहीं सुनाई देता चीत्कार
उनके सामने रोने की ज़रुरत नहीं है

बम हम फोड़ नहीं सकते क्योंकि
क़ानून का उल्लंघन हम कर नहीं सकते

पर हमारे वश में जो है
वह तो हम कर ही सकते हैं


ख़ुदा


मैं तो तुम्हारा पीछा करते हुए ही
दुनिया में आया था

और पीछा करते हुए ही चला जाऊँगा

मेरे सारे कौतुक तुम्हारे लिए ही थे

मेरा हर बहुरूप तुम्हारे लिए ही था

सरकती पैंट और बहती नाक के समय से लेकर

बढ़ती तोंद और झूलती झुर्रियों के समय तक

मेरे सारे कार्य व्यापार तुम्हारे लिए ही थे

तुम हो कि रौशनी में, रंगों में, सुगंधों में मिलते हो


सपनों की लाशें


शायद हम एक ऐसी दुनिया से विदा लेंगे जहाँ,

कातिल ख़ुद से ही बरी कर लेता है ख़ुद को

जज ख़ुद को ही बर्ख़ास्त कर लेता है

धमाके ख़ुद ही हो जाते हैं
और लोग उनमें ख़ुद ही मर जाते हैं

लड़कियाँ ख़ुद ही बलात्कार कर लेती हैं

जाँच ख़ुद ही बदल जाया करती हैं

फाँसी का फंदा ख़ुद ही बन जाता है

किसानों और लड़कियों में ख़ुद ही होड़ मच जाती है

कि मरने में किसकी संख्या ज़्यादा होगी


पैसे ख़ुद ही लुट जाते हैं
देश ख़ुद ही बर्बाद हो जाता है

दलित ख़ुद ही अछूत हो जाते हैं

बुरका ख़ुद ही पड़ जाता है औरतों की अक्ल पे


किसी ने नहीं मारा
नरेंद्र दाभोलकर को, गोविन्द पानसारे को,

एम एम कलबुर्गी को, गौरी लंकेश को

सत्य की बात करने वालों ने
जंभाई लेते हुए एक दिन सोचा

कि अब मर जाते हैं और मर गए


कोई भी ज़िंदा नागरिक
ख़ुद कुछ नहीं कर रहा हमारे देश में

नदी की सतह पर ख़ुद--ख़ुद तैर रही हैं
देश के सपनों की लाशें


तोड़ने दो


वे मजबूर हैं अपनी खिसियाहट से

अगर विचार की कोई मूर्ति बन पाती
तो वे उसे तोड़ते

गाँधी को क्यों मारते?

क्यों तोड़ते वे बुद्ध की प्रतिमा को बामियान में,

अगर समता की कोई मूर्ति बन पाती तो


या वे भगत सिंह को फांसी पर क्यों चढ़ाते,

उस क्रांति को फाँसी पर न लटका देते

जिसका सपना उसकी आँखों में था?


वे क्यों तोड़ते मंदिरों को, मस्जिदों को?

उन्हें नहीं तोड़ना पड़ता आंबेडकर की मूर्ति को

अगर संविधान की कोई मूर्ति बन पाती तो


देवियो सज्जनो,
सदियों से झुंझलाए लोगों पर तरस खाओ

जब उन्हें भूख लगेगी, तब करेंगे बात


विजय कान्त वर्मा


जन्म 7 जुलाई 1946 चांदा, महाराष्ट्र


शिक्षा इंजीनियरिंग, प्रबंधन तथा कानून में आईआईटी चेन्नई, एनआईटी रायपुर तथा जीवाजी विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर।


पेशे से इंजीनियर दो वर्ष भिलाई स्पात कारखाने में 27 वर्ष भारतीय वायुसेना तथा रक्षा मंत्रालय आदि में। पिछले 18 वर्षो से उच्च शिक्षा में शिक्षक से लेकर प्रबंधक के विभिन्न पदों पर काम किया। संप्रति डॉ सीवी रमन विश्वविद्यालय पटना में चांसलर, रबिन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल में वरिष्ठ सलाहकार तथा शोध ग्रुप के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं।


मुस्कान


लगे, जब ईश है खफा, संसार बेवफा

सम्मुख अवसाद का दलदल है,

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


नदी को मालूम है सागर में खो जाएगी

अपनी मिठास दे कर खारी हो जाएगी

फिर भी उसकी रवानी में जोश, लहरों में कलकल है

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


लौ को मालूम है कुछ देर में खत्म हो जाएगी

अंधकार और गुमनामी में, फिर से खो जाएगी

फिर भी आखरी सांस तक जद्दोजहद और हलचल है

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


बस्तियों में प्रदूषण का सैलाब आ गया है

हरियाली पर कांक्रीट का घना साया है

बेफ्रिक सियासतदान,
कफ़न में दौलत समेट रहा, पलपल है

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


माँ को मालूम है, बिट्टू बुढ़ापे में छोड़ जाएगा

नौकरी की आड़ में, पैसोंs के झाड़ में, खो जायेगा

चल पड़ती है त्याग की राह,
जानते कि आगे स्वार्थ का दावानल है

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


खलनायक के भाग्य में अट्टहास सदा आता है

नायक कथा के अंत तक पिसता, पिटता जाता है

राम को वनवास, सीता को धरती का संबल है

मुस्काइये, कि मुस्कानों में मुश्किलों का हल है!


गगन राग


नजरें जम गई, धड़कन थम गई

तुमसे जो पहली बार मिला,

उस तंग गली और भीड़ भाड़ में,

सूनेपन का फूल खिला!

फिर सूनापन और मौन लगे,

जाने क्यों मन को भरमाने,

क्या सही प्यार, हां यही प्यार

का अंतहीन फिर तर्क चला!

फिर जाने कितनी बार मिला

सभी कहा और सभी सुना,

प्यार तुम्ही से करता हूँ

बस चाह के भी में यह कह ना सका!

में सोच में था तुम कह दोगी,

तुम सोच रहीं उसकी बारी

चला सिलसिला बरसों तक

ना मै हारा ना तुम हारीं!

सप्तपदी में सोचा था,

बुलवाएगा शायद पंडित

पर प्यार ना उसकी पोथी में

परंपरा की लाचारी!

भीड़ भरी वह तंग गली

बन गई है मेरा ताजमहल

अब भी जब गुजरूँ उस रस्ते

बढ़ जाती है दिल में हलचल

धड़कने जो हर पल जपती रहीं

लब क्यों कहने से चूक गए,

दिल जिन शब्दों पर धड़कता था

क्यों शब्द जुबां पर नहीं उठे!

अब दूर गगन में बस गईं तुम

जाने क्यों टिमटिमाती हो,

जो कह ना सका दिल कहता है,

क्या धड़कन वह सुन पाती हो!


तुम्हारे जाने के बाद


उन्मुक्त गगन में भर उड़ान

दूर कहाँ तुम चले गए,

हम सपने थामें सांसो में

वादों के हाथों छले गए!

आवाज गई परवाज गई,

हम भटक रहे हैं बियाबान,

खनक हंसी की छोड़ गए

तड़पाने के अंदाज नए!

प्यार की फितरत बस इतनी,

आहों से इसकी है यारी,

प्यार के रंग सुरमयी तो हैं

पर दर्द के साँचों ढल गए!

घड़ियों की सुईयां थम सी गईं

सदियों से जिनसे बंधे थे हम,

अब मौका ना दस्तूर रहा,

सोचें समझें मरहले नए!

औकात नहीं है शिकवों की

भूले से लब पर आ जाएँ,

रच गए प्यार की वो धुन तुम

आंसू की जिसमे जगह नहीं!

यादों के शीतल उपवन में,

रंग और खुशबू की है बहार,

फिर भी हैं दर्द के कुछ कांटे

कोई तो बही में दर्ज करे!

यह अजब वसीयत लिख दी है

जाते जाते तुमने जानम,

ले गए अश्क सब आँखों भर

मुस्कानों से, हमें बांध गए!


रेगिस्तान की आवाज


रेगिस्तान के सीने पर सर रख

धडकनों की सुगबुगाहट सुनी है मैंने

पूछा, इतना खुद को क्यों तपाते हो

कभी अंगार कभी बर्फ बन जाते हो

धीमे से नर्म रेंतो ने फुसफुसाया

अभिसार की मंद लौ को धीरे से उठाया

रेगिस्तान में भी जाने कहाँ से,

ले आये थे मजनू पर पत्थर चलाने

उन जालिमों को जलाने, खुद को जलाता हूँ

चांदनी के मरहम से लैला के जख्मों को सहलाता हूँ!


रेगिस्तान के सीने पर सर रख

इतिहास की सरसराहट सुनी है मैंने

पूछा फैलाव कितना तुम्हारा

गहराई में क्या अब भी धधकती है ज्वाला

लहरदार सतहों पर मारू की तान उभर आई

बोला, स्वाभिमान की तलवार ने धार यहीं पाई

अपनों से जूझते वीरों ने दूध की गरिमा बढ़ाई

रेगिस्तान में बहा गये खून की नदियां

जयचंदों की प्यास आजतक फिर भी ना बूझपाई!


रेगिस्तान के सीने पर सर रख

सतरंगी चुनरियों की अकुलाहट सुनी है मैंने

जौहर की गर्मी से गरिमा की चादर बुनी है मैंने

उस मिट्टी से स्वाभिमान की गंध अब तक आती है

लेकिन अब भी पद्मावती जौहर में ढकेली जाती है

कभी निर्भया कभी बानो बन जाने कौन सा कर्ज चुकाती है

आज के वहशीपन पर कलम टूट जाती है

सांस ठहर जाती है शर्म भी शर्माती है

बदनुमा दाग क्यूँ बनता जा रहा है इन्सान

रेगिस्तान चीख रहा, कब बदलेगा हिंदुस्तान!!


कठपुतली


हर शै है यहाँ एक कठपुतली

हर कठपुतली की डोर कई

डोर चलाने वाले कई

डोर कभी दिख जाती है,

और कभी छुप जाती है

डोर कभी होती ही नहीं, पर होती है

कभी ले जाती ऊँचे मंच में

कभी डालती है प्रपंच में

डोर कभी रेशम सी प्यारी

कभी हथकड़ी सी है भारी

कठपुतली लेकिन आजादी का भ्रम पालती है

डोर से बंधी हूँ जान कर भी नहीं मानती है!

डोर होती है कभी आँखों में

तो कभी बातों में

कभी उफनते हाव भाव में

कभी शबनमी जज्बातों में

लोकलाज भी कभी डोर बन नचाती है

कर्तव्य के धागों में कभी उलझती है

कभी रुढी का रोना

कभी पीढ़ी दर पीढ़ी परंपरा की गाँठ ढोना

स्वच्छन्दाता भी कभी डोर बन जाती है

क्रांति के मुलम्मे में

नई पीड़ी को भटकाव दे जाती है

भारत तेरे टुकड़े होंगे नारा लगाती है!

डोरियो का उलझा संसार

लगा है कठपुतलियों का बाज़ार

कौन सी डोर नचा रही

कठपुतली को भी पता नहीं

डोर चलाने वाली भी एक कठपुतली

और उसके ऊपर कठपुतली

कठपुतलियों का अनंत सिलसिला

डोर के अंतिम सिरे पर बैठा

कारीगर हैरान है

एक डोर दी तो थी कठपुतली को

खुद को संभालने, विवेक की,

जाने कहाँ खो दिया

दुखों का जंगल अपने लिए बो दिया!


मैं एक लिफाफा हूँ


मैं एक लिफाफा हूँ!

जन्म की तरह बहुत अमूल्य;

अपने साथ उत्सुकता लाता हूँ,

कभी बूढ़ी आँखों की चमक बन जाता हूँ

कभी बिरही को सुकून से भर जाता हूँ

जीवन का हर रंग लाता हूँ

मैं एक लिफाफा हूँ!


मैं एक लिफाफा हूँ!

मृत्यु की तरह क्षण भंगुर

चाहे जितनी कीमत हो अन्दर

क्षण में फाड़ दिया जाता हूँ

मिटटी में मिला दिया जाता हूँ

जीवन से झाड़ दिया जाता हूँ

मैं एक लिफाफा हूँ!


मैं एक लिफाफा हूँ!

श्रम की सच्ची पहचान

कभी निकलता हूँ कारखानों से रंगीले रूप में

तो बनता हूँ कभी रद्दी से गरीबी की धूप में!

कभी चूल्हे की आग हूँ

कभी मल्टीनेशनल का पैकेजिंग राग हूँ!

मैं एक लिफाफा हूँ!


मैं एक लिफाफा हूँ!

सेवा का सबसे बड़ा उदाहरण

महान रहस्यों का सच्चा आवरण

वफ़ादारी की पराकाष्ठा

प्रेषक की सच्ची आस्था

सभी मुसीबतें झेल लेता हूँ!

दुआएं भी नहीं लेता हूँ

मैं एक लिफाफा हूँ!


मैं एक लिफाफा हूँ!

भारतीय जीवन दर्शन का सच्चा रूप

निष्काम जीवन का प्रतिरूप

खुलासों के दौर में मर्यादाओ को ढांकता हूँ

मजमून को समान आदर से आंकता हूँ

फल की इच्छा रहित कर्मयोग का पर्याय हूँ

अपने आप में गीता का अध्याय हूँ

मैं एक लिफाफा हूँ!


पुरवाई की पुकार


बसंत के आंगन में इस बार

लड़खड़ाते कदमों से आई पुरवाई

बदरंग बदहवास, क्लांत्त और अशांत

कुछ शरमाई, कुछ घबराई

बोली, साल दर साल

अन्दर धीरे धीरे कुछ कट रहा है

जोशो जज्बात कहीं बूंद बूंद घट रहा है

ऋतु चक्र की सवारी में

अब कहाँ, आनंद और सुकून

अब नहीं रह गया उसमें

उत्सवधर्मी जुनून

समय के पहिये को

प्रदूषण के हथौड़े ने

गोल से चौकारे कर दिया है

धूरियों मे उपेक्षाओं का

जहर भर दिया है

पता नहीं समाज का पहिया भी

कब चले, कब रुक जाए

कभी अंगद का पैर

तो कभी तूफानी दौर

सभी ऋतुएं पुरवाई की तरह सहमी हैं

भय और लाचारी की गहमा गहमी है

ऋतुएं भी लिंग भेद का शिकार हो गई हैं

मानव की छेड़छाड़ से लाचार हो गई हैं

स्त्री सशक्तीकरण का दौर है

बदहाली, ऋतु चक्र, की भी काबिले गौर है

निर्भया की तरह ऋतुचक्र के लिए

कोई तो मोमबत्ती जलाये

सांसें मंद होने से पहले

सब कुछ भस्म होने से पहले

सोई मानवता को झकझोर कर जगाए!

सभी हाथ लगाएं, नई क्रांति लाएं

पुरवाई में वही रंग वही चमक

शोखियों की वही धमक फिर से ले आएं!


बसंत का जादू


तुमने लहराया तो

आँचल कुछ बोलने लगा

मौसम का बसंती राज

गुनगुना कर खोलने लगा

रंगों से महक उठी

फूलों से मिठास फैली

मौसम की नींद उड़ी

हवाओ का मन डोलने लगा!


तुम्हारी सांसो पर सवार

इस बार बसंत आया है

टेसुओं पर तुम्हारे

अधरों का रंग छाया है

गेहूं की बालियों पर

तुम्हारी शरारती का है खुमार

तुम्हारे बदन को छू

हवाओं ने फाग गाया है!


तुम्हारी हंसी का है जादू

पाखी उड़ान भूल गए

तुम्हारे नैनों का है खुमार

मौसम ने छेड़े राग नए

इस बसंत को तुमने

ऐसा मदहोशी के पल दिए

सदियों तक सदियों को

यह बसंत याद रहे!


यादों के ताजमहल


मुंडेर पर फिर गुनगुनाती धुप उतर आई

पंछियों ने फिर चहक आवाज यों लगाई

सब कुछ वैसा ही है, मगर वैसा कुछ नहीं

दबे पाँव फिर तुम्हारी, याद चली आई!


तुम्हारे पदचाप की खुशबू रोज फ़ैल जाती है

चिड़ियों की खिलखिलाहट आज भी लुभाती है

लगता है तुम अचानक धप्प से आजाओगी

सच्चाई तुम्हारे ना होने की, उदास कर जाती है

उदास कर, मत होना उदास, देती हो दुहाई!

दबे पाँव फिर तुम्हारी याद चली आई!


बर्तन भी तुम्हारी याद में, जाने कहाँ खो गए

व्यंजन तुम्हारी छुअन बिन बेस्वाद से हो गए

हवा भी थम गई साँस नहीं ले पाती है

पानी से उठते सुर, बेजान कितने हो गए

हर लम्हों पर अमिट छाप तुमने है लगाई

दबे पाँव फिर तुम्हारी याद चली आई!


बालों के गुच्छे पड़े हैं छत पर जो तुमने छोड़े थे

दीवारों पर चिपका बिंदिया, ताजमहल जोड़े थे

तुम्हारी खनकती हंसी, गूंजती है अब भी यहाँ

रिवाजो के कितने प्रतिमान हमने यहाँ तोड़े थे

विछोह प्रेम की पराकाष्ठा, बात तुमने समझाई

दबे पाँव फिर तुम्हारी याद चली आई!


पंचतत्व


समुन्दर में, धरा पर

पोखर में या आसमां पर

आँखों में या आँचल में

हर कहीं पानी, पर अर्थ कई

प्रेमियों के दिलों को भिगाता खुशियाँ दे जाता है

झोपड़ी में टपकता रुलाता है

कभी एक बूंद से जीवन दे जाता है

कभी बाढ़ में हुक्मरानों की कुर्सी भी हिलाता है

अनबुझ पहेली बन जाए

गर पानी अपने पे आजाए

जिंदगी की तरह उलझे

सुलझे ना सुलझाए!


वायु की कितनी आयु

बोतल में बंद तो प्राणदाता

बन जाए प्रदूषण तो जी दहलाता

बेलाग बहे तो कुछ भी कर जाए

कटरीना, ईसाबेल, सुनामी बन

खौफ लाए, कहर ढाए

कभी हौले से चले तो दिलों को गरमाए भरमाए

वरुण भी एक पहेली है

कोई कैसे समझ पाए!


अग्नि के अनगिनत रूप असंख्य नाम

जठराग्नि से सूरज की गर्मी तक

कहीं दिखती है कहीं छुपती है

जन्म की गुलाबी सेक से

मृत्यु की दहकती शैय्या तक

हर किसी को गीता का सार सुनाती है

कुछ जलाती, कुछ बुझाती

क्षुद्रता का अहसास कराती

अग्नि एक अजूबा है

गरमाए और जिज्ञासा बढ़ाए!


पृथ्वी और आकाश

वह भी तो बड़ी पहेली हैं

माँ की तरह कोमल

मृत्यु की भांति कठोर

सभी के होकर भी किसी के नहीं

हम ही सीमाओं में इन्हें बांधते हैं

और मर्यादाए लांघते हैं

अशोक से एलेक्स्जेंडर तक

पहेली सुलझाने में खप गए

हर बार पहेली ने लिए रूप नए

ओढ़े भी इसी को, सोए भी इसी पर

पर समझकर भी सुलझा न पाए!


पंचतत्व सबसे बड़ी पहेली है

सदियों से सदियों तक

लगे हर हल सही

लगे हर हल गलत

शायद नजरिए का फर्क

लेकिन पहेली है कितनी सरल

जो बोए सो पाए

इन्सान इतनी सरल पहेली

क्यों नहीं हल कर पाए!


शब्दों का संसार


शब्द और नि: शब्द भी

होते कितने गरजदार

कभी चमकते बिजली से

कभी बिखेरे अंधकार!


दौपदी का शब्दवार

अँधा पुत्र, अँधा लाचार

शब्दों का यह विस्फोट

बन गया महाभारत आधार?

चीर हरण पर नि: शब्द ने

या फिर खोला युद्ध द्वार

या फिर कुरुक्षेत्र बन उभरे

गीता के अदभुद उद्गार

क्या कैकई के शब्दों में

बैठा था मानस का रचनाकार

या सीता का नारी हठ

बन गया दशानन का संहार

शब्द और नि: शब्द का

अगम अनंत है विस्तार!


नवजात का, क्रंदन भी

आनंद क्यों जगाता है

विदाई पर वही विलाप

आंसू क्यों ले आता है

नायिका का मौन हास

मन को क्यों लुभाता है

खलनायक का अट्टहास

भयभीत क्यों कर जाता है

हाय! शब्द मिलन पर

क्यों गुदगुदाता है

वही शब्द बिदाई पर

दर्द क्यों दे जाता है

जितना सरल उतना उलझा

शब्दों का अदभुत संसार!


चाहे वन्देमातरम हो

या हो इन्कलाब घोष

पद्मावती का नि: शब्द जौहर

या हो मणिकर्णिका का रोष

गांधीजी का नि: शब्द आग्रह

या सुभाष का हो आक्रोश

शिवाजी की चपलता हो

या मोदी का पुरजोश

शब्दों से परे है

शब्दों का ओर छोर!


शब्द हो नि: शब्द भी

ना रंग है ना रूप है

शिल्प चाहे जैसा हो

असर बहुत खूब है

सृष्टि और संहार का

घृणा और प्यार का

छांव यही धूप है

हमसे निर्मित, पर अनियंत्रित

शब्द नि: शब्दों का व्यवहार

कभी चमकते बिजली से

कभी बिखेरे अंधकार!


मुखौटों का जादू


जीवन का रंगमंच

मुखौटों की दिलकश कहानी है

कहीं अधूरी कहीं पूरी

कहीं नई और कहीं पुरानी है

उतार चड़ाव, काले सफ़ेद

अँधेरे उजाले के मंजर कई

बदलते मुखौटों के पीछे

सारी उम्र गुजर जानी है !


कभी ओवर, कभी अंडर प्ले

परफेक्ट शॉट कब हो पाता है

कभी अपनों कभी परायों को

विभिन्न मुखोंटो से

आदमी बहलाता और रिझाता है

इतने टेक रिटेक में

थोड़ी कमी फिर भी रह जाती है

एक नन्हा शिशु ही शायद

स्वाभाविक अभिनय कर पाता है !


किशोर वय की वह

शरारत, शैतानियों का दौर दौरा

कभी माँ कभी मास्साब

से बचने मासूमियत का मुखौटा

माँ का प्राय: रीझ जाना

मास्साब से हमेशा ही पिट जाना

चाहा कितना बचपन का मुखौटा

फिर मिले, लेकिन वह ज़माना नहीं लौटा !


हर खुबसूरत चेहरे को देख

करवटें बदलती तरुणाई

पहली नज़र में प्यार होने का भ्रम

कानों में गूंजती शहनाई

लेकिन मजनू लैला हीर राँझा

के मुखौटे बनते हैं अलग सांचों से

सात फेरों का मुखौटा ओढ़

हर आमोखास को बात समझ आई


बढ़ती उम्र में

मुखौटों का रंग ही अलग होता है

तनहाई उत्सुकता और आशंका

इंसा कभी हँसता कभी रोता है

सारे मुखौटों के


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