include_once("common_lab_header.php");
Excerpt for विरह के रंग (सुरिंदर कौर) by , available in its entirety at Smashwords


विरह के रंग







सुरिंदर कौर





वर्जिन साहित्यपीठ



प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
9868429241 / sonylalit@gmail.com

सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - सितंबर 2018

कॉपीराइट © 2018 वर्जिन साहित्यपीठ

कॉपीराइट

इस प्रकाशन में दी गई सामग्री कॉपीराइट के अधीन है। इस प्रकाशन के किसी भी भाग का, किसी भी रूप में, किसी भी माध्यम से - कागज या इलेक्ट्रॉनिक - पुनरुत्पादन, संग्रहण या वितरण तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा अधिकृत नहीं किया जाता। सामग्री के संदर्भ में किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में जिम्मेदारी लेखक की रहेगी।

चुप से महफिल में


चुप से महफिल में वो आये हुये है।
बातें, होठों में कुछ दबाये हुये है।

आँख से गिरे है, शबनम के कतरे
शोले दिल में दफनाये हुये है ।

दिल ही जाने अब दिल की ये बातें
हम तो दिलो जाँ, लुटाये हुये है।

खूब तरसे है, उस शख्स की खातिर
जो मुद्दत से हमको भुलाये हुये है।

यार के बिना, कोई छुये न कफन को
नये हैं कपङे और हम, नहाये हुये है।



जोङा है जब मैने एक एक लम्हा


जोङा है जब मैने एक एक लम्हा।
पाया मैनें खुद को सिर्फ तन्हा।

यादों को तेरी छुपाती, भी तो कहाँ
कोई भी कोना न खाली था दिल का।

जल रही है बरसो से, बुझती नही
ये तेरे दिये एहसासों की शमाँ।

बेचैन से रहते है जज्बात ये मेरे
बता तो सही कहाँ लूं मै छिपा।

बेनाम से कुछ रिशते साथ तो हैं
कैसे कहूं मै हूं यार बहुत ही तन्हा।



अजब अब ये जिंदगी का कारोबार


अजब अब ये जिंदगी का कारोबार चलता है।
जख्म एक भरता नही, दूजा तैयार मिलता है।

थक जाते है रास्ते तलाश करते करते हम
पहुंचे मंजिल पर तो, नया हकदार मिलता है।

काट कर रख देता है जङे वो अपना खास भी
जो भी आजकल नया, मिलनसार मिलता है।

ये बुद्धिजीवी, ये संत, धर्म के ये ठेकेदार
ऊपर से मीठे, अंदर भरा हंकार मिलता है।

शिकायत करें भी तो किससे और करू कैसे
हर शख्स इलजाम लगाने को तैयार मिलता है।



वो रूठना तेरा मुझे, नागवार गुज़रा


वो रूठना तेरा मुझे, नागवार गुज़रा।
दिन फिर मेरा सारा, सोगवार गुज़रा।

गलती तो मेरी ही थी, मानती हूं मैं
चुप रहना तेरा पर, पलटवार गुजरा।

माफ मुझे तू अब, कर या न कर
दरिया ऐ इशक, दीवानावार गुज़रा।

दीदार की तेरे हसरत तो है सभी को
मायूस लेकिन हर, उम्मीदवार गुज़रा।

इशक तुम से सनम कर ही बैठे है
दिल तो अब ये, हो ख़तावार गुज़रा।



कटी जो तुम बिन


कटी जो तुम बिन एक उमर थी।
बीती जो तुम संग, वो थी जिंदगी।

किया जो तूने, शायद इशक था,
की जो मैनें, वो तो थी बंदगी।

तूने जो की, वो थी दिल्लगी
निभाई पर मैने, दिल की लगी।

यकीन के बदले में मिली शर्मिदगी।
कर गया तू साथ मेरे दरिंदगी।

बेवफाओ की, की तूने नुमाइंदगी।
शर्मिदा रही मुझसे मेरी ही जिंदगी।



तेरे बिना कैसे गुज़ारा करेंगे


तेरे बिना कैसे गुज़ारा करेंगे।
हर दम तुमको पुकारा करेंगे।

बात दिल की कैसे कहे तुमको
खामोशी से एक हम इशारा करेंगे।

ये जो करते हो गैरों पे करम
कैसे हम ये ग्वारा करेंगे।

नहा के आओ चाँदनी से तुम
खामोश तुमको निहारा करेंगे।

हालत दिल की अजब हुई है
कैसे तुझ से किनारा करेंगे।



खामोशियों का भी एक शोर होता है


खामोशियो का भी एक शोर होता है।
किस्मत का भी एक जोर होता है।

हर आहट पे यू तो सोचये है वही होगा,
देखने पर मगर वो कोई और होता है।

जब कभी न वो कही कभी दिखाई दे,
आखो का समन्दर पुरजोर होता है।

बात कहने वाले उठ जाते है जब जहा से
तब कही उन के कहे पर कोई गौर होता है।



नहीं चाहा था


नहीं चाहा था ऐसा हो गया है।
उसे देखे जमाना हो गया है।

वो भी गुजरे कभी मेरी गली से
बहुत आजमाना हो गया है।

तेरा वो देखना पलट के मुझ को
बस ये दिल दीवाना हो गया है।

बैठे है हसरत ए दीदार लिये
बहुत अब तरसाना हो गया है।

जिंदगी जीने की खातिर अब
बस तू इक बहाना हो गया है।



लोग साथ होकर भी


लोग साथ होकर भी हमनवा क्यू नही होते।
बातें बहुत करते है, हमजुबां क्यू नही होते।

एक दहशत सी तारी है हर एक बस्ती में
गर आदमी है तो हम, इंसा क्यू नही होते।

सजाये रखते हैं जिनको हम दिल के शीशे में
मेरे गमगीन होने पर वो गमजदा क्यू नही होते।


Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-6 show above.)