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Excerpt for काव्य मञ्जूषा 2 by , available in its entirety at Smashwords



काव्य मञ्जूषा
2
(काव्य संकलन)


संपादन मंडल
ललित मिश्र और ममता शुक्ला



वर्जिन साहित्यपीठ


प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
virginsahityapeeth@gmail.com; 9971275250


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - अक्टूबर, 2018

कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ



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समर्पण


स्वर्गीय श्री ताराकांत मिश्र

श्रीमती मंजुला मिश्र

श्रीमती सोनी मिश्र

उत्कर्ष मिश्र


मरद अब दूसरी औरत ले आया है

मिथिलेश कुमार राय


मरद अब दूसरी औरत ले आया है
पहली औरत
पाँच बेटियाँ जनने के बाद
दरवाजे पर बँधी पशुओँ संग
अपना दिल लगाने लगी है
मरद जब भी उसे टोकता है
उसकी आवाज कर्कश होती है
एक छोटे से वाक्य मेँ
कई तरह की भद्दी गालियाें मेँ
मरद उसे रोज बताता है
कि उसकी किस्मत कितनी फूटी हुई है

यह सब देखती-सुनती पहली औरत
चुपचुप अपना माथा धुनती रहती है
और विधाता को कोसती रहती है
लोगोँ ने उसे कुछ भी बोलते बहुत कम सुना है
रोते बहुत देखा है

दूसरी औरत गर्भ धारण नहीँ करती
जैसे ही उसका मासिक ठहरता है
वह अजीब-अजीब हरकतेँ करने लगती है
जैसे वह अपने खाने मेँ
तीखी मिर्ची की मात्रा बढ़ा देती है
वह सुपारी की जगह
लहसून चूसने लगती है
कभी भी अचानक से सीढ़ियोँ से फिसल जाती है
रक्त-स्राव के बाद ही
उसकी हरकतेँ सामान्य हो पाती हैँ
मुसकुराती हुई
वह डायनोँ को दो-चार गालियाँ देती है
और जब मरद नहीँ होता
पहली औरत की बाँहोँ मेँ समाकर
फूट-फूटकर रोने लगती है
अस्फुट शब्दों में वह कहती है कि
मैं कभी उर्वर होना नहीं चाहती



दूध के भ्रम में मैं माँ का माँस चूसा करता

मिथिलेश कुमार राय



कूड़े के ढेर पर
मैं दूध ही ढूंढ़ा करता हूँ

मेरे गाल पिचके हुए हैं
मेरी आँखें अंदर, बहुत अंदर तक धँस गई हैं
मैं ज्यादा देर तक कहीं खड़ा रहता हूँ तो
मेरी टांगें काँपने लगती हैं
जरा कड़क के बोल देता है कोई सामने
तो मैं सर्दी में भी पसीने से नहा उठता हूँ

मेरा पेट कितना बढ़ गया है
मेरी छाती कितनी धँस गई है
मेरा चेहरा बे-पानी क्यों दिखता है
मेरे बदन का रंग काला है
मेरे दाँत काले-काले होकर
अब हिलने लगे हैं
जब कभी भी मैं दर्द से बेहाल-बेहाल हो उठता हूँ

मैं जन्मा था तो
मेरी माँ के स्तन से दूध कहाँ चला गया था
मैं घंटों स्तन मुंह में लिए
ईश्वर से कंठ तर हो जाने की प्रार्थना किया करता था
माँ शायद अन्न के लिए कोई मंत्र बुदबुदाती रहती थीं
मैं दूध के भ्रम में
माँस को चूसा करता था
मेरा बचपन बिना दूध के बीता है

मैं कूड़े के ढ़ेर पर
दूध ही ढूंढ़ा करता हूँ




जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं

मिथिलेश कुमार राय



जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं
और बिना घूंघट के घूमती हैं पूरा गांव
वे खेत तक बेधड़क जाती हैं
वहां कोई चिड़िया फुर्र से उड़ती है
तो उसे वे देखती हैं
दूर तक आकाश के उस छोर तक

जैसे वे बात-बात पर मुसकाती हैं
और किसी भी बात पर खिलखिलाने लगती हैं

नइहर लौटते ही जैसे
देह को लगने लगता है पानी
फेफड़े को स्वच्छ हवा मिलने लगती है
और भूख बढ़ जाती है इतनी
कि दिन में तीन-तीन बार खाने का मन करने लगता है

कि जैसे पीलापन झड़ने लगता है
और कोंपलें फूट पड़ती हैं
जैसे वे मनपसंद गहने बनवाने के लिए
सुनार के पास बैठ जाती हैं घंटों
कि जैसे शाम की चिंता उन्हें
उतना नहीं सताती
चेहरे पर पसर जाती है निश्चिंतता
वे बेफिक्र हो जाती हैं

ठीक ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि वह लौटता है तो उसके साथ ही
घर की मुस्कुराहट भी लौट आती है
और देह का हरापन भी लौट आता है
कि लौटता है परदेसी
तो सड़क से सूनापन भाग जाता है
और तब रात भी आती है तो
कोई डर नहीं रह जाता है

ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि जब भी वह लौटता है
बिना बात के कोई त्योहार हो जाता है



शायद कोई पागल रहा होगा

गौरव भारती



एक अधेड़ इंसान

लंगड़ाते हुए चल रहा था

चलते चलते रुक रहा था

लगा रहा था हिसाब

अपनी गंदी, लंबी सिकुड़ी उँगलियों पर

न जाने किस चीज का

मैंने रूककर पूछा -

क्या गिन रहे हो’

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोला

मेरी खद्दर झोली पर आँख गड़ाए

मुँह चबाते हुए बोला -

दिखता नहीं क्या

सड़क नाप रहा हूँ

दूर-दूर तक फैली सड़क

लंबी-चौड़ी सड़क

रोज नापता हूँ

मेरे साथ नापोगे तुम भी

रहने दो तुमसे न होगा’

मैले, बेतरतीब बाल खुजाते हुए

रूककर उसने एक सवाल पूछा -

लेखक हो क्या?

मैंने हँसकर कहा -

हां, लिख लेता हूँ, कोशिश में हूँ

लेकिन तुमने कैसे पता लगाया’

सवाल काटते हुए उसने फिर पूछा -

किस जमात के लेखक हो?

मने किसके लिए लिखते हो?

कौन-सा झंडा?’

अकबकाते हुए मैंने कहा -

सबके लिए लिखता हूँ

लेखक हूँ, नेता नहीं’

उसने हँसते हुए कहा -

फिर दो कौड़ी के लेखक हो तुम

चलो, मेरी तरह सड़क नापोगे?

बहुत मजा आएगा’

मैं चिढ गया

थोड़ा खुद को सँभालते हुए

उम्मीद की मोमबत्ती जलाई

और बोला - ‘एक दिन मुझे पढ़ा जाएगा

तुम देख लेना

अच्छे पाठक जिन्दा हैं अभी

वे पढ़ेंगे मुझे

तुम देख लेना’

उसने एक सलाह दी

अपने गाल को लंबे नाखूनों से खुजाते हुए

हँसते हुए बोला -

कोई झंडा थाम लो’

मैंने पूछा –

तिरंगा?’

उसने कहा - ‘वो तो दो रूपए में मिलता है’

उसने कहा - ‘अरे कोई भी,

जिसकी बाजार में कीमत ज्यादा हो

अब तुम तो लेखक हो

ज्यादा पता होगा

मैं तो सड़क नापता हूँ

लंबी-लंबी सड़क

दूर तक फैली सड़क

हर जगह की सड़क एक जैसी नहीं होती

जैसी सड़क, वैसे लोग

जितनी अच्छी सड़क,

उतनी रफ़्तार

लोग रुकते कहाँ है तुम्हारी तरह इन सड़कों पर

मुझे भी यह सड़क पसंद नहीं

कोई नहीं रुकता

गुम हो जाते हैं

क्षणभर में पता नहीं कहाँ

देहाती सड़कों पर चलते हुए लोग गुम नहीं होते

यूँ अचानक

उन्हें देख सकते हैं जाते हुए

मुझे वे पसंद हैं

तुम्हें कौन-सी सड़क पसंद है?’

उसने फिर पूछा

मैं चुप था

खामोश था

उलझ रहा था कहीं

कि अचानक उसने पूछा -

मुझे नायक बनाओगे तुम

अपनी कहानी का?

कैसे गढ़ोगे मुझे?

मेरे किरदार को?

मैं तो बस सड़क नापता हूँ

लंबी-चौड़ी सड़क

तरह-तरह की सड़क

मैं पलट रहा हूँ पन्ने सौन्दर्यशास्त्र के

गुण नायक के देख रहा हूँ

वह किरदार अभी भी

अनगढ़ है

उसके सवाल

गूंज रहे हैं

मेरे भीतर के नेपथ्य में

और बाहर एक ही जवाब है -

शायद, कोई पागल रहा होगा।



काश !

गौरव भारती



एक बात कहूँ -

किसी से न कहना

जब कूटती हूँ अदरक, चाय की खातिर

जी में आता है, एक चोट मार दूँ

इस दीवार पर

और मन करता सिल दूँ जुबान

इन सफेदपोशों की

जैसे रोज सिलती हूँ ग्राहक के कपड़े

काश! मैं नायिका होती

निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ सरीखी

तो तोड़ डालती बहुत कुछ

बहुत कुछ, जो रोज तोड़ना चाहती हूँ

मगर रोज टूटती हूँ मैं

कभी-कभी साँस अटक जाती है

भीतर पड़ती दरार के बीच

मैं लड़ती हूँ

गिरती हूँ, उठती हूँ

खीझती हूँ, चीखती हूँ

सब जारी है

मगर कोई नहीं देखता

सब चाय का स्वाद लेने में लगे हुए है।



आखिरी दिन

गौरव भारती



उम्र के इस पड़ाव पर

जब जी रहा हूँ

बचे-खुचे आखिरी दिन

जिंदगी ...

काठ की भारी-भरकम संदूक-सी लगती है

जिसकी सुध लेते हैं लोग,

जब तलाशते हैं

खोए हुए कागजात

जमीन के, घर के

मगर, अच्छा लगता है मुझे

बहुत अच्छा लगता है

लौटते हैं जब ये मेरी ओर

थकी निगाह लिए

निगाह में छुपी उम्मीद लिए

अजीब किरदार है मेरा

आपने तो देखा ही होगा

अक्सर दो जोड़ी बुझती आँखें लिए

यादों की तरफ लौटता हूँ

यादें....

मोमबत्ती की लौ सरीखी

हिलती-डुलती झेंपती-मुड़ती

कब धुआं हो जाए, पता नहीं

शायद, मेरी आखिरी साँस

इन्हीं गलियों में अटक जाए कभी

कुछ पता नहीं

जब द्वार के सामने सड़कों पर

बच्चे हुड़दंग मचाते हैं

मैं बहुत चीखता हूँ

बहुत खीझता हूँ

चिल्लाता हूँ

उन्हें भगाता हूँ

जाने कहाँ से मुझमें ताकत आ जाती है

विजय भाव से गदगद हो जाता हूँ

बच्चे मुझे चिढ़ाते हैं

लेकिन सच कहूँ

मेरा जीतना

उनका चिढ़ाना

अच्छा लगता है बहुत

शायद, तालाब को भी अच्छा लगता होगा

किसी का कंकड़ फेंकना

ये बच्चे हैं

मेरी खीझ नहीं समझेंगे

बड़े भी नहीं समझते

शायद, सब कुछ समझने की एक उम्र होती है

मैं भी तो अब समझ रहा हूँ

बहुत भयावह है यह उम्र

ख़ामोशी भीतर तक बस जाती है

आवाज निकालो तो

कहीं दबकर रह जाती है

शायद, अटक जाती है कहीं

दो चौखटों के बीच

जहाँ सन्नाटे का राज है

जहाँ सब कुछ टूटता है बस

जहाँ सब कुछ बिखरता है बस

देख रहा हूँ

मौत को करीब से

शायद, अटक जाऊँ

घड़ी की चलती सुइयों की तरह

बैट्री जिसकी हो जाती है ख़त्म

क्या पता, भरी हुई साँस

फेफड़े में ही रह जाए

कोई आखिरी इच्छा, जुबां को न छू पाए

कोई चेहरा साथ न हो

मैं मांगता रहूं

चंद पल, चंद साँसें

अलविदा के लिए

शायद मिले, शायद न मिले

मैं तो अब मुंतजिर हूँ

हवा के उस झोंके का

जो उड़ा ले जाती है

शाख से चिपके

सूखे पीले पत्ते को

समय के उसी गह्वर में

जहाँ से उसकी यात्रा शुरू हुई थी

और फिर शुरू होगी।



मेरे हमसफर!

माला झा



चाहा है तुमने मुझे हर रंग में, हर रूप में

साथ दिया है तुमने मेरा हर छाँव में, हर धूप में

सोचती हूँ लेकिन कभी यूँ ही बैठकर

ए मेरे हमसफ़र!

जब जिंदगी की गोधूली बेला आएगी

चेहरे पर झुर्रियां और बालो में सफ़ेदी छाएगी

जब मेरे अधर न होंगे गुलाबों जैसे

आँखें न होंगी गहरी झील जैसी

क्या तुम तब भी इन आँखों में खो जाओगे?

क्या अधरों पर प्रेम चिन्ह दे पाओगे?

क्या कई दिनों से उलझी जुल्फों को सुलझा पाओगे?

सोचती हूँ बस यूँ ही बैठकर

ए मेरे हमसफर!

क्या उम्रभर मेरा साथ निभाओगे?



पूछना चाहती हूँ

माला झा



मुझसे उत्पन्न होकर

मेरे ही अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाना

तुम ही कहो, क्या ये उचित है?

अपने ही रक्त से सींचकर

नौ महीने तक तुम्हें गढ़ती हूँ

भयंकर पीड़ा सहकर

तुम्हें इस दुनियाँ में लाती हूँ।

मुझसे उत्पन्न होकर

मेरा ही दमन करना

तुम ही कहो, क्या ये उचित है?



सोचा है कभी, मैं न होती तो क्या होता

तुम भी न होते और न ये जहाँ होता

न चाँद, न सितारे और न सूरज होता

न ही इस दुनियाँ का कोई वज़ूद होता।

मुझसे उत्पन्न होकर

मेरा ही वज़ूद मिटाना

तुम ही कहो, क्या ये उचित है?



न मुझे चाहत तुम्हारे धन-दौलत की

न ही चाहत तुम्हारे साम्राज्य की

मुझे मेरे हिस्से का बस दे दो

इज्जत से जीने का हक़ दे दो।

मुझसे उत्पन्न होकर

मेरा हक मारना

तुम ही कहो, क्या ये उचित है?



तुमसे आगे नही, तुमसे पीछे नही

तुम्हारी हमकदम बनना चाहती हूँ

तुम्हारे काँधे से मिलाकर अपना कांधा

हौसलों की उड़ान भरना चाहती हूँ

मुझसे उत्पन्न होकर

मेरी उड़ान को रोकना

तुम ही कहो, क्या ये उचित है?



यादें

माला झा



कुछ यादें

जोंक की तरह

चिपकी हुई जहन से

चूस लेती है जीवन के रस को

कुरेदती रहती हैं ज़ख्मों को

खींच लाती है बार-बार हमें

अवसाद की उन्हीं अँधेरी गुफ़ाओं में

जहाँ गूँजती हैं सिर्फ सिसकियाँ

जहाँ बिखरी हैं टूटे ख़्वाबों की किरचियां

कुछ यादें

ताज़ी हवा के झोंकों सी

ले आती है हमें

ख़्वाबों की रंग-बिरंगी दुनियाँ में

खुशबुओं की वादियों में

हर खुशबू से जुडी एक याद

होने लगता है प्रवाहित

नस-नस में जीवन रस

बढ़ जाता है हृदय का स्पंदन

मुखर हो उठती है फिर से

जीने की लालसा

ये यादें भी

अजीब शय है

हँसाती हैं, रुलाती हैं, गुदगुदाती हैं

कभी हौसला पस्त करती हैं

तो कभी हौसलाफ़ज़ाई।



कूड़ा बीनती लडकियाँ

हरदीप सबरवाल



वे भौंकते कुत्तों से नहीं डरतीं

अपनी सधी चाल से है चलतीं

बेखौफ अपनी रोटी तलाशतीं

अपनी-अपनी बोरी उठाए

वे कूड़ा बीनती लड़कियाँ



आम बच्चियों-सी छोटी-सी दिखतीं

पर हो जाती हैं परिपक्व जल्द ही

समझ लेती हैं फर्क गदीं नजरों का

गंदगी को हर दिन नापते चलतीं

वे कूड़ा बीनती लड़कियां



बाँट लेती हैं वे साथ-साथ चलतीं

जो कुछ बीन इकट्ठा करतीं,

मानो, बाँट रही हो कुछ खुशियाँ

झगड़ा करके फिर से हंसतीं

वे कूड़ा बीनती लड़कियां



किसी स्कूल को जाती टोलियाँ

हाथों में आईसक्रीम और गोलियाँ

उनकी वर्दी, बस्तों के आकर्षण में

किसी परी कथा को खोजतीं

वे कूड़ा बीनती लड़कियां



कुछ अलग होकर भी होती हैं

बाकी बच्चियों-सी ही चंचल

रोज भरती नए रंग अरमानों में

आसमान को भी छूना चाहती हैं

वे कूड़ा बीनती लड़कियां....




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