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Excerpt for हृदय की देह पर by , available in its entirety at Smashwords


हृदय की देह पर





सुशीला जोशी











वर्जिन साहित्यपीठ


प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
9868429241 / sonylalit@gmail.com


सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण – फरवरी 2019


कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ


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सुशीला जोशी
9719260777

जन्म तिथि: 5 सितम्बर 1941


शिक्षा: एम ए (हिंदी एवं अंग्रेजी), बीएड

संगीत प्रभाकर: गायन, सितार, तबला, कथक (प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद)

प्रकाशन: 6 पुस्तकें, 39 साझा संकलन; विमर्श, गीत गागर, रंगोली, वाणी, सरस्वती पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित

सम्मान: अन्य तथा अर्णव कलश एसोसिएशन द्वारा प्रदत्त
12
पुरस्कारों के साथ उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान लखनऊ द्वारा 2009 में “अज्ञेय” पुरस्कार


मेरी अपनी बात


मैंने 13 वर्ष की अवस्था से हृदय की अभिव्यक्ति को कागज पर उतरना शुरु कर दिया था। हृदय में उगे भाव कभी पद्य बन कर बहते तो कभी गद्य बन कर अपनी कहानी कहते। जब कभी अतीत हावी होता तो कलम से साथ साथ आँखें भी टपकती और पन्नें चितते जाते। यह क्या विधा थी नही जानती थी किन्तु दुबारा पढ़ने पर कुछ अलग सा महसूस होता तो अलग उठा कर रख देती। इस प्रकार बिना कोई शास्त्र पढ़े अपनी विधाएं स्वयं बनाती गयी और सतत लिखती रही।

तुकांत कविताएं शुरू से लिखती थी लेकिन उनका विधान, विभाग, लय, धुन, ताल सब मेरी कविता जन्य होती थी। हर कविता की अलग धुन दिमाग में उपजती और मैं उसे पूरे दिन हफ़्तों तक गुनगुनाती रहती। जिसे सुनाती खूब वाहवाही बटोरती। अतः लेखन की ओर से निश्चिंत रहती थी।

समय बदला। नेट का युग शुरू हुआ। कई साहित्यिक समूहों से जुड़ी। अपनी कविताएं भेजी जिन में से कुछ को गीतों की संज्ञा मिली और कुछ को कविताओं की। तब गीत और कविता का फर्क समझ आया।

गीतों और कविताओं को समूहों में भेज कर पाठकों की प्रतिक्रिया स्वरूप जो प्रसाद मिला उससे पता चला कि मेरा लेखन दोषपूर्ण है क्योंकि उनमें छंन्द के नियमों का अभाव है। मात्रा दोष है। मात्राएं क्या होती है? इनकी गणना कैसे होती है? मात्रपतन क्या होता है? गीत निर्वहन में कौन कौन से तत्वों का ध्यान रखना पड़ता है? इन सभी प्रश्नों से मैं अनभिज्ञ थी। क्योंकि मैंने काव्य की परिभाषा - "वाक्य रसात्मकम कव्यम " पढ़ी थी। साथ ही यह भी सोचती थी कि प्रथम कवि के मुँह से जो वाक्य फूटे थे उनकी मात्रा गणना उंसने नही की होगी। कविता तो हृदय का ओज है जो अपनी लय, ताल, छंद, धुन और गति स्वयं साथ ले कर आती है। वही किसी गीत कविता की वास्तविक छंन्द या मापनी है।

कविता होगी, भाषा होगी तभी तो व्याकरण होगा। भाषा में व्याकरण की खोज होती है न कि व्याकरण के नियमों पर शब्द सजा कर भाषा लिखी जाती है। ठीक इसी प्रकार किसी छंन्द या मापनी पर शब्द सजा कर गीत या कविता नही लिखी गयी होगी। प्रथम कवि ने भी नही कोई मापनी नही ली होगी।

"मानिषाद प्रतिष्ठा त्वमगमः" - जैसे वाक्यों के बाद ही व्याकरण की खोजा गया होगा।

मैं प्रतिक्रियाएं पढ़ती रही और स्वयं को उनकी कविताओं को पढ़ पढ़ कर परिमार्जित करती रही। एक साहित्यिक समूह में जब मैंने अपना यह विचार रखा तो उसी समूह के विरिष्ठ, प्रतिष्ठित और जाने माने व्याकर्णाचार्य व छन्दाचार्य महेश ज्योति जैन जी ने कहा - "जब हम मापनी या किसी छंन्द को चुन कर कविता लिखते है तो हम कविता नही लिखते वरन कविता की खेती करते है। लेकिन जब बिना किसी मापनी या छंन्द को चुने कोई कविता लिखते हैं तो वह वास्तविक हृदय से निकली कविता कहलाती है।"

यही सत्य भी है। पर कहते है न कि यदि कोई अपना अपराध स्वीकार कर ले तो वह सदा के लिए अपराधी सिद्ध हो जाता है। वही बात मुझ पर भी लागू हुई और उस समूह ने मुझे टिकने नही दिया। जबकि उसी समूह के मूर्धन्य गीतकार ने मेरे गीतों को सराहा भी और गीतकारों के बीच ला कर खड़ा भी किया।

कहते हैं कि साहित्य और कला के लिए माँ वाणी स्वयं मनुष्यों का चुनाव करती है जो अपनी विशिष्ट क्षमता से जुड़े होते हैं । इसलिए उनमें कुप्रवृत्तियों का अभाव होता है। वे माँ वाणी को साधने में इतने रम जाते है कि उनके मानस को कुप्रवृत्तियां प्रभावित कर ही नही पाती। लेकिन मैंने साहित्य के क्षेत्र में सबसे अधिक खेमेबाजी देखी। जिसका प्रभाव मेरे लेखन पर भी पड़ा। अंततः मैंने इस राह को छोड़ना ही बेहतर समझा।

लहरों के थपेड़े खाती अपने गीतों की नाव पर मैं हौसले से सवार रही और निरन्तर गीतों में सुधार करके आज आपके हाथों उन्हें सौंप रही हूं। आपकी प्रतिक्रियाओं का मुझे इंतजार रहेगा।

मैं विभिन्न समूहों की आभारी हूं जिन्होंने अपनी प्रतिक्रिओं के माध्यम से मुझे सीखने का अवसर दिया। गीतों को उनके अनुसार परिमार्जित करने का अवसर दिया।

सुशीला जोशी
9719260777



अम्बर को पाती भिजवायी


अम्बर को पाती भिजवाई

आकुल व्याकुल धरती ने ।।


घना तपा डाला है उसने

प्राण कंठ तक आ अटके

भीतर के द्वन्दों के संग

भूत आवारा सा भटके


क्यों कर वोहुआ हरजाई

लिक्खा बिलखती धरती ने ।।


खुद तो खाली खाली रहता

मुझको क्यों खाली समझा

खग हरियाली नदी सरों में

हृदय मेरा व्याकुल समझा


क्यों सबकीकाया कसकायी

लिक्खा उमसती धरती ने ।।


भटक रहे खग प्यासे प्यासे

हरी भरी झुलसी है घास

रुग्ण हो गयी सरिता खेती

नही दीखती कोई आस


होती नही मेरी सुनवाई

लिखा झुंझला कर धरती ने ।।


मैं उड़ी जा रही हूं


लौह के यान में मैं

बैठी उड़ी जा रही हूं

मैं क्षितिज के पार भी

देखो उड़ी जा रही हूं ।।


बादलों को चीर कर

अब क्षितिज धरती बनी

फेंन की नर्म चादर

यान की तरणी बनी

धूम के फैले वलय में

मैं धंसी जा रही हूं ।।


मौन पसरा राह में

दूर तक एकांत है

पंख फैला विहग सा

यान भी कुछ भ्रांत है

गगन के रिक्त पथ में

मैं उड़ी जा रही हूं ।।


नील टुकड़ा काँच का

छा गया है यान पर

हृदय में ले हौसला

हँसा है अभिमान पर

आत्मबल हाथ साधे

मैं उड़ी जा रही हूं ।।


रो रहे सह्याद्रि वन

रो रहे हैं आज देखो

आंसू से सह्याद्रि वन ।।


हो रहे विस्फोट उनमें

हो रही बदरंग काया

घेर कर उनको खड़ा है

काल आततायी साया

वेदना से चीखते हैं

मखमली सह्याद्रि वन ।।


हो गए हैं आज बौनें

खो रहे बीहड़पना

पेड़ अब कंक्रीट के

करे प्रदूषण घना घना

रवि उजाला खो चुके हैं

चमकते सह्याद्रि वन ।।


पूरा तन जख्मी हुआ है

संग में कर्क रोग

करके सौंदर्य दोहन

बना दिया आतपी योग

खो चुके हँसती हवाएँ

मुस्कराते सह्याद्रि वन ।।


मेरे लिए समय लाना


अब की बार जब आओ

मेरे लिए समय लाना ।।


सारी रात जाग जाग कर

प्यार के गन्धी बनेंगे

बात बात पर उर सुलगती

आग को ठंडी केरेंगे

अपने मन मुझे बैठा

बस एकाकी ही आना ।।


अनुबंधों का मान रख कर

मर्यादा को ओढ़ेंगे

कच्चे धागे से सम्बंध

बिन खींचे ही तोड़ेंगे

अपने सभी उपकरणों को

वहीं छोड़ कर बस आना ।।


यूँ ही सारी आयु बीती

कभी कूल न मिल पाए

उधड़ी रही बखिया उर की

जिसे कभी न सिल पाए

निज उर का ज्वार परे रख

बस घर के भीतर आना ।।


जीती रही जिंदगी फिर भी


कई हलाहल पी कर बैठी

जीती रही जिंदगी फिर भी ।।


बिना किये की

करनी धरनी

चले सड़क पर

सहने भरनी

जीभ हलक से

चिपकी ठहरी

सिसक रही थी

कथनी करनी

घाव हृदय के सी कर बैठी

जीती रही जिंदगी फिर भी ।।


खाँमोखा की

धौस मनव्वत

और लिए थी

तोहमद संग

उलट फेर के

फेरे में आ

रँग हो गए

सभी बेरँग

क्षत बदरंग कगारों बैठी

जीती रही जिंदगी फिर भी ।।




रहे दिखाते

सदा उंगलियां

खिली रही

फिर भी कलियाँ

रहे देखते

टेढ़े हो कर

भरी रही सब

फिर भी गलियां

ऐंठी उजड़ी उजड़ीबहारें

मौन कल्पना ले कर बैठी ।।

अमलतासीसीगजल

गुलमोहर है गुनगुनाता

अमलतासी सी गजल ।


जेठ का तपता महीना

और सूरज की दहन

झोंझ में चलती हवाएँ

दे रहीं सबको जलन

भीतर तल से गढ़ रहा है

धुन गुलाबासी नवल ।।


निज तले छाहँ हो या न हो

न रही परवाह उसे

वक्त के नखरे उठाना

आज तक भाया उसे

चुभतीचटखी धूप में भी

खिलखिलाता बन सजल ।।


रेत बनी सरिता सिसकती

लू बनाती उर्मियाँ

फेंकता आसमान गोटी

बिखरती रवि रश्मियां

अपनी मस्ती में मगन हो

गा रहा है हो अचल ।।



ज्वालामुखी फ़टे


हद से गुजरे कोई हलचल

ज्वालामुखी फ़टे ।।


हूक उठाती रही वेदना

अधर चबाते हुए

रुसवाई कहीं हो न जाये

डरे बताते हुए

व्यर्थ रही सब मान मनौती

अपनी हठ पर डटे ।।


बादल के भीतर की हलचल

हँस धरा सरसावे

पर मेरे भीतर की कलकल

ध्वनि कर पछतावे

जैसे तैसे दिन तो कटता

रतियाँ कैसे कटे ।।


सूरज का उर शोर मचाता

मौन लीले रात

उर की पीड़ा आय गले तक

बता न पावे बात

खाली खाली मन का अँगना

राधा राधा रटे ।।

अबकी बार तुम्हारा आना


अबकी बार तुम्हारा आना

सचमुच आने जैसा हो

मन्दिर के घण्टे की ध्वनि पर

स्तुति गाने जैसा हो ।।


अन्तस् मौन कर रहा प्रतीक्षा

आँखे साँकल पर अटकी

बनी लिजलिजी कोई आशा

छायी है भटकी भटकी

कलकल करती अल्हड़ सरि का

सागर पाने जैसा हो ।।


मैं राधा तुम श्याम रहोगे

मन में वृंदावन होगा

मदिरयामिनी रेशमीदेह पर

एक नया मधुबन होगा

पारिजात की मस्त गन्ध में

सिर तक न्हाने जैसा हो ।।


महुआ बन कर झरे प्रणय और

कुमुद फूल सी प्रीत खिले

गन्ध झूमती सप्तपर्णी की

रैन नेह की रीत मिले

मन्द मधुरवंशी की धुन पर

बजे तराने जैसा हो ।।

सूरज के रखवाले घोड़ें


आज निरंकुश बन बैठें हैं

सूरज के रखवाले घोड़ें ।।


सारे अड़ियल बने हुए हैं

उगले मुँह आग के गोले

कहना टाले मालिक का

मार दुलत्ती सब कुछ बोले

चाबुक को भी मुड़ कर तोड़ें

सूरज के मतवाले घोड़ें ।।


सूरज की फिक्र नही है

पीड़ा का भी जिक्र नही है

राहें तो अब भी वें हीं हैं

लेकिन चलता चक्र नही है

मनमाने हो बने भगोड़ें

सूरज के रथवाले घोड़ें ।।


कहीं बनाते धरती लावा

कहीं मौसमी ताना कसते

कहीं आलसी बन बैठते

कहीं कुहासे में जा फँसते

कैसे ये हो गए निगोड़ें

सूरज कर रखवाले घोड़ें ।।

सप्तपर्णी की सुगन्ध


पसर रही भीनी भीनी

सप्तपर्णी की सुगन्ध ।।


रात का दूसरा पहर

सुवास की अति लहर

स्मृति की व्यंजना में

ढाह रहा कोई कहर

बुन रही है नवल छंन्द

सप्तपर्णी की सुगन्ध ।।


देहरी चुपके लांघें

डर किसी बन्धन में बांधे

पी की साँसों से निकल

उर वीणा तार साधे

मुस्काये मृदु मन्द मन्द

सप्तपर्णी की सुगन्ध ।।


रोम रोम पुलक गया

अणु अणुभी थिरक गया

सम्मोहन में गन्धके

गीत भी नव गमक गया

रच रही नूतन से बन्ध

सप्तपर्णी की सुगन्ध ।।

साथ में चलता रहा


मीत बन कर हादसों के

साथ में चलता रहा

गीत पल छिन जिंदगी के

साथ में चलता रहा ।।


जूही चंपा की कली सा

महके से छंन्द में

हो प्रपाती गीत निर्मल

फूटे है बन्ध में

एक नया सायासाबन

साथ में चलता रहा ।।


गुलमोहरी बनीअगन सा

गीत लाल लाल था

तमतमाती दोपहरी में

लपट का नव व्याल था

वेदना की चेतना में

आप ही जलता रहा ।।


प्रेम की बाहें बंधी थीं

आस्था की भीड़ में

कोपलें नव फूटती थीं

वर्जना की पीड़ में

देवालय की दीपशिख सा

स्वयं ही जलता रहा ।।





सरितजलधिआशा निराशा

गीत में ढलते रहे

चिर प्रतीक्षा और यादें

प्रीत में पलते रहे

अति घन एक कल्पना सा

पटलपरसजतारहा।।

गढ़लो

पृथक करो

कुछ स्वयं से

इक नया दिनमान

गढ़ लो ।।


प्याज के छिलके चढ़ा सा

नोंचलों नभ कुहासा

निरंकुश प्रजातन्त्र से

एक अधगढ़ी परिभाषा

जानने को कुछ नया सा

इक नया प्रतिमान

गढ़ लो ।।


फ़टे कपड़े मोड़ रख दो

बस गहर गड्ढे ढक कर

भूख चिपटे पेट बांधो

चिथड़ी पट्टियां कस कर

किलकते उत्सवों हेतु

एक नया जनगान

गढ़ लो ।।


नव निकलती कोपलों पर

पवन चंचल पहरा देगा

कल किलकता या कसकता




क्या पता कैसा होगा

दो घड़ी बस बैठ करके

इक नया अनुमान

गढ़ लो ।।



अनुरागी मन में


ज्यों ही जागी याद पिया की

अनुरागी मन में

आशा के नव दीप जले हैं

उर सूनेपन में ।।


रातें जागी अम्बर जागा

जाग उठे सारे सपनें

सजल सलौनी की छवि देखो

लगा साँस माला जपने

अब तो धूनी सी रमती है

अनुरागी मन में ।।


सात रँग की सजी रंगोली

घर के चौबारे

थाल सजाए ले ठाढ़ी हूं मैं

घर के द्वारे

एक लगन हैहठ सीकरती

अनुरागी मन में ।।


चूड़ी कंगन कुमकुम रोली

हैं सारे पहने

कटि किंकणी पावँ में झांझर

बजते हैंगहनें

मोहक छवि मुसकाय पिया की

अनुरागी मन में ।।


गीत उर में हँस रहे हैं


वेदना का तन सम्हाले

गीत उर में हँस रहें हैं ।।


संगलिए कुछ वर्जनाएं

साथमेंसम्वेदना भी

कुछ कराहती साथ खुशियां

भ्रमित पी की चेतना सी


कान में चुपके से कुछ कह

ताना मुझ पर कस रहें हैं ।।


रात की कालिख से लिपटी

आधुनिकताएँ सम्हालें

डाल कर गलबाहें सोये

स्वयं ही कुछ आजमाएं


मन ही मन आकुल हुए

यूँ हीअजाने डस रहें हैं ।।


बुझा चूल्हा जली हाँड़ी

और टूटी चारपाई

बिना वजह आँगन खचाखच

सफेद झूठी सी सफाई


हृदय उगे आकंठ अटके

प्राण तल में धंस रहें हैं ।।

बोलतीं हैं शिलाएं


मौन के गह्वर में अक्सर

बोलतींहैं शिलाएं ।।


आत्मघाती वेदना भी

मुखर हो कर बोलती

टिमटिमाते जुगनुओं सी

नवल पट को खोलती

उष्ण के कटिबन्ध विह्वल

कह रहेंहैं निज व्यथाएँ ।।


मौन के उत्तुंग श्रृंग से

झर रही है व्यर्थ पीड़ा

जल प्रपाती स्फुरण को

दे रही है अर्थ क्रीड़ा

शब्द में निशब्द हो कर

गढ़ रही है नव कथाएं ।।


शब्द में आ शब्द उलझे

लड़ रही खामोशियाँ

कंठ से इक दूसरे के

झड़ रहीं हैंदूरियां

कतरा कतरा हो छतरी

हृदय सम्वेदनाएँ ।।

सतत

अपनेंअपनेंरास्तें

अपनी अपनी सडक

अनवरत पगडंडी पर

जाते सबके दिल धड़क ।।


अपनींअपनींथकानें

अपनींअपनीं दुकानें

चिंगारी बन हौसले

उठतें हैं अक्सर भड़क ।।


भोर की इक तलाश भी

लील जाती है जीवन

सामने आ जाती है

किसी दामिनी की कड़क ।।


आँखेंजाती चुंधिया

मंजिल पर पहुँच कर भी

धूल उड़तीदे जाती

आँखों में चुभती खड़क ।।


कनकव्वो की चोंच में

तीखी मिर्ची का रंग

जीभ या हलक ही नही

मन भी उठता है तड़प ।।

प्रेम की पाती


भोर की पहली किरण

कर रही है आगमन ।।


ऋतु बसन्ती दूत को

लिख रही पाती धरा

हो भयातुर ठंड से

मलिन दिखती अप्सरा

पी मिलन की चाहना

अब नही होती सहन ।।


हे पवन ! ऋतुराज से

कहना धरा तो त्रस्त है

ठंड के आतंक से

हुआ सभी कुछ ध्वस्त है

हठी बन बैठा पवन

अबकठिन हुआजीवन ।।


खगी कलरव नीड़ में

कर रहा है वंदना

कंधे पर हल उठाये

कृषक करता अर्चना

कर्म पथ पर चल पड़े

सृष्टि के सब ही चलन ।।

संयमऔरवर्जनाहारे

तेरे देख नयन कजरारे

संयम और वर्जना हारे ।।


बंजर की बस्ती में आ कर

ऊदे से सपनों में खोए

नया स्फुरण लिए हृदय में

मुक्त चेतना साथ संजोए

कोर नयन दिखते रतनारे ।।


चंचल हिरनी इत उत डोले

मुस्काहट के फूल बिखेरे

नयी कहानी गढ़ती बोले

बिना कहे सभी कुछ बोले

बनें सभी के आज दुलारे ।।


आकुल सी कुछ खोज रही है

निज दृष्टि में जगत समाये

अम्बर धरती डोल रही है

रह रह कर चमक चपलाये

स्तब्ध जीव जंतु हैं सारे ।।


आज दलदल में फंसे है प्राण भी


आज दलदल में

फंसे है प्राण भी ।।


जीवन पनपता पत्थरों में

मुस्करा कर गीत गाएं

वर्जनाएँभी उर तलक की

मरूथली बन पिघली जाएं

फिर भी देखो

बन रहे अनजान भी ।।


बगावती हो गयी हैंनदियाँ

और आवारा हुए घन

हो गयीं आतंकीराहें

मुँह चिढ़ाते पंकजी वन

आवक देखो

देखते किसान भी ।।


कुतर रही चीटियां मकोड़ें

बांबियों में किलक किलक

छिपकली के मुँह में रोये

किट पतंगे बिलख बिलख

घबरा रहा

आजइंसान भी ।।

या .....लिखूँ


संसद की तकदीर लिखूं

या प्रजातन्त्र की पीर लिखूं ।।


चारों ओर है हाहाकार

बलात्कार और चीत्कार

कुछ कहने से डर लगता है

परे हुआ सबका व्यवहार


जयचंदी लिखूँ सियासत

या फिर खरा कबीर लिखूँ ।।


बहुत पुष्ट था अपना मत

पर अन्तस् का भान नही था

दिशा अराजक होगी अब

इसका भी संज्ञान नही था


जनता मन का हाल लिखूँ

या फ़टी बिवाई पीर लिखूँ ।।


अर्थव्यवस्था संसद तक

न्यायपालिका घेरे में

शंका छायी है समाज में

समझे न किस फेरे में


नेता की असलियत लिखूँ

या भारत की तस्वीर लिखूँ ।।


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